सायणभाष्यम्

 

हे सारमेय त्वं सूकरस्य वराहस्य।। द्वितीयार्थे षष्ठी।। दर्दृहि। विदारय। सूकरोऽपि तव दर्दर्तु। विदारयतु। युवयोर्नित्यवैरित्वात्। अस्मान्मा दशेत्यर्थः।। स्तोतृनित्यर्धर्चः पूर्वस्यामृचि व्याख्यातः।।

 

H.H. Wilson- Do the rend the hog: let the hog rend thee: Why dost thou assail the worshippers of Indra? Why dost thou intimidate us? go quitly to sleep.

Ralph T.H. Griffith- Be on the guard against the boar, and let the boar beware of thee. At Indra’s singers barkest thou? Why dost thou seek to terrify us? Go to sleep.

 

इन दोनों ही विदेशी भाष्यकारों ने सायणाचार्य का ही अनुकरण किया है। वस्तुतः पाश्चात्य वेदभाष्यकारों मेें यह योग्यता ही नहीं थी कि वे वेदादि शास्त्रों का भाष्य कर सकें। दुर्भाग्यवश न केवल पाश्चात्य देश, अपितु आर्य्यावर्तीय (भारतीय) कथित प्रबुद्ध वर्ग इन्हीं को विशेष प्रामाणिक मानता है। आचार्य सायण की भी वेदार्थ में कोई योग्यता नहीं थी। इन तीनों के भाष्य का सार है-

 

‘‘हे शूकर व कुत्तो! तुम परस्पर लड़ो, एक-दूसरे को मारो, काटो। इन्द्र के उपासकों वा स्तुति करने वालों पर आक्रमण क्यों करते हो? हमें क्यों कष्ट देते हो। जाओ, चुपचाप सो जाओ।’’

 

मेरे संसार के प्रबुद्धजनो! क्या आपको इन कथित वेदभाष्यकारों के भाष्य में कुछ भी सार्थक बात दिखाई देती है? अब हम इस मंत्र का महर्षि दयानन्द का आधिभौतिक भाष्य प्रस्तुत करते हैं-

 

महर्षि दयानन्द भाष्य

 

पदार्थ- (त्वम्) (सूकरस्य) यः सुष्ठु करोति (दर्दृहि) भृशं वर्धय (तव) (दर्दर्तु) भृशं वर्द्धताम् (सूकरः) यः सम्यक् करोति (स्तोतृन्) विदुषः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यस्य (रायसि) रा इवाचरसि (किम्) (अस्मान्) (दुच्छुनायसे) (नि) (सु) (स्वप)।।4।।

 

भावार्थ- हे गृहस्थ त्वमैश्वर्यं संचित्य धर्मे व्यवहारे संवीय विदुषः सत्कृत्य श्रीमानिवाचरास्मान् प्रति किमर्थं श्वेवाचरति नीरोगस्सन् प्रतिसमयं सुखेन शयस्व।।4।।

 

पदार्थ- हे गृहस्थ जिस (सूकरस्य) सुन्दरता से कार्य करने वाले (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्यवान् (तव) तुम्हारे (सूकरः) कार्य को अच्छे प्रकार करने वाला (दर्दर्तु) निरन्तर बढ़े (त्वम्) आप (रायसि) लक्ष्मी के समान आचरण करते हो और जो सब को (दर्दृहि) निरन्तर उन्नति दें अर्थात् सब की वृद्धि करें (स्तोतृन्) स्तुति करने वाले विद्वान् (अस्मान्) हम लोगों को (किम्) क्या (दुच्छुनायसे) दुष्ट कुत्तों में जैसे वैसे आचरण से प्राप्त होते हो उस घर में सुख से (नि, षु, ष्वप) निरन्तर सोओ।।4।।

 

भावार्थ- हे गृहस्थ! आप ऐश्वर्य का संचय कर धर्म व्यवहार में अच्छे प्रकार विस्तार कर और विद्वानों का सत्कार कर श्रीमानों के समान आचरण करो, हम लोगों के प्रति किसलिये कुत्ते के समान आचरण करते हैं, नीरोग होते हुए प्रति समय सुख से सोओ।।4।।

 

इस मंत्र पर मेरा मत

 

अब हम इस मंत्र पर विचार करते हैं। इस मंत्र का देवता इन्द्र, ऋषि वसिष्ठ, छन्द बृहती, स्वर मध्यम है। इस ऋचा तथा इसमें आए हुए कुछ पदों पर विचार करते हैं-

सूकरः = यः सुष्ठु करोति (म.द.भा.) 
दृ विदारणे= प्रभूत वृद्धि करना {दर्दर्तु= भृशं वर्द्धताम् (म.द.भा.)। दर्दृहि= अत्यन्तं वर्धय (ऋ.3.30.21)}
रायसि= रा इवाचरसि (म.द.भा.)
दुच्छुनायसे= दुष्टेष्वेवाचरसि (म.द.ऋ.भा.7.55.3)
सारमेय= {सरमा= सरणात् (नि.11.24), या सरति सा सरला नीतिः (म.द.ऋ.भा.4.16.8), समानरमणा (म.द.ऋ.भा.5.45.7)} स्वार्थ में तद्धित।

 

मेरा आधिदैविक भाष्य

 

(त्वं) सारमेय-पूर्व ऋचा से अनुवृत्त, इन्द्र तत्व के साथ-2 रमण करने वाली मरुद् रश्मियां {इन्द्रो वै मरुतः क्रीडिनः (गो.उ.1.23), मरुतो ह वै क्रीडिनो वत्रं हनिष्यन्तमिन्द्रमागतं तमभितः परिचिक्रीडुर्महयन्तः। (श.2.5.3.20)} (सूकरस्य) जो अपने सभी कार्य अच्छी प्रकार तथा तीव्रतापूर्वक करता है, ऐसे उस इन्द्र तत्व=तीक्ष्ण वायु मिश्रित विद्युत् को (दर्दृहि) प्रभूत मात्रा में समृद्ध करती हैं, इसके साथ ही वे मरुद् रश्मियां, विशेषकर प्राणापान रश्मियां उस तीक्ष्ण इन्द्र तत्व रूपी विद्युत का असुर तत्व आदि बाधक पदार्थों के निवारण हेतु उचित विभाग भी करती हैं, जिससे वह इन्द्र तत्व संयोजक पदार्थों को सम्यक् रूपेण सम्पीडित कर सके। (तव) उन मरुद् रश्मियों को (सूकरः) सुष्ठुकारी व शीघ्रकारी इन्द्र तत्व भी (दर्दर्तु) नाना प्रकार से उपयुक्त दिशाओं में विभक्त करता है, जिससे वे नाना परमाणुओं के मध्य संयोजन क्रियाएं करने में सक्षम बनती हैं। वे मरुद् रश्मियां एवं इन्द्र तत्व (स्तोतृनिन्द्रस्य) उस इन्द्र संज्ञक विद्युत् के द्वारा प्रकाशित व सक्रिय परमाणु आदि पदार्थों को (किम् रायसि) {रायः = पशवो वै रायः (श.3.3.1.8)} छन्दादि रश्मियों के समान तरंग के तुल्य व्यवहार करने के लिए क्यों प्रेरित वा विवश करते हैं? इसका उत्तर देते हुए कहा कि (अस्मान् दुच्छुनायसे) हमें, यहाँ से तात्पर्य इस ऋचा का कारण रूप वसिष्ठ ऋषि अर्थात् प्राण नामक प्राण तत्व है, ऐसी प्राण रश्मियां दुष्ट असुर रश्मियों के अन्दर {इव= पादपूरणार्थ} सर्वतः विचरती हुई (नि षु स्वप) नितराम् व्याप्त हो जाती हैं, जिससे असुर तत्व क्षीण बल होकर प्रसुप्तवत् आकाश तत्व में लीन हो जाता है।

 

भावार्थ- इन्द्र रूपी विद्युत् को विभिन्न मरुद् रश्मियां, जो उसके साथ क्रीड़ा करती हुई सी निरन्तर गमन करती हैं, अनुकूलता व प्रचुरतापूर्वक समृद्ध करती हैं। इसके साथ ही विभिन्न पदार्थों के संयोग व वियोग के समय विद्युत् बलों का उचित विभाग भी करती हैं। उधर इन्द्र रूपी विद्युत् भी परमाणुओं के संयोग व वियोग की प्रक्रिया के समय मरुद् रश्मियों का उचित विभाग करती है, जिससे उनके मध्य अनुकूल आकर्षणादि बल उत्पन्न हो सकें। वे मरुद् रश्मियां एवं विद्युत् दोनों ही संयोग वा वियोग करने वाले परमाणुओं को उस प्रक्रिया के समय तरंगीय गति के समान गति प्राप्त कराते हैं। इसके साथ ही इस प्रक्रिया में संयोजक बलों से युक्त प्राण नामक प्राण रश्मियां संयोग प्रक्रिया में बाधक बन रही डार्क एनर्जी के अन्दर व्याप्त होकर उन्हें नितान्त दुर्बल बना देती हैं। इससे वह सर्वथा क्षीणबल डार्क एनर्जी बिखर कर आकाश में मिल कर निष्क्रिय हो जाती है।

 

इस ऋचा का सृष्टि प्रक्रिया पर प्रभाव-

 

आर्ष व दैवत प्रभाव- इसकी उत्पत्ति वसिष्ठ अर्थात् प्राण नामक प्राण रश्मियों से होती है। {वसिष्ठः = प्राणा वै वसिष्ठ ऋषिः (श.8.1.1.6)} इससे सिद्ध है कि इस छन्द रश्मि के उत्पन्न होने के पूर्व विद्यमान प्राण रश्मियां इस छन्द रश्मि को प्रभावित व सक्रिय करने में भी सहायक होती हैं। इसका देवता इन्द्र होने से इन्द्र तत्व समृद्ध होता है अर्थात् विद्युत् बलों की तीक्ष्णता बढ़ जाती है। 
छान्दस प्रभाव- इसका छन्द बृहती होने से यह विभिन्न परमाणुओं को बांधकर अपेक्षाकृत बड़े अणुओं के निर्माण में सहायक होती है। इसका स्वर मध्यम होने से यह छन्द रश्मि संयोज्य परमाणुओं के बाहरी आवरण, जो सूत्रात्मा वायु रश्मियों का होता है, के मध्य प्रविष्ट होकर अपना बंधक प्रभाव दर्शाती हैं। 


ऋचा का प्रभाव- जब दो विद्युत् आवेशित कणों को परस्पर निकट लाया जाता है, उस समय उनके चारों ओर विद्युत् चुम्बकीय बल उत्पन्न हो जाता है। उन बल रश्मियों के चारों ओर सूक्ष्म मरुद् रश्मियां निरन्तर क्रीड़ा करती हुई गमन करती हैं। वे ऐसी मरुद् रश्मियां विद्युत् आवेश के उचित बलों को समृद्ध करती हैं। इससे ऋणावेशित कण आकाश तत्व में खिंचाव उत्पन्न करने लगता है। यही ऋण आवेशित कण अपने अन्दर से उत्सर्जित मरुद् रश्मियों को उचित रीति से विभक्त करके धनावेशित कणों से उत्सर्जित धनंजय रश्मियों को आकृष्ट करने में सहयोग करता है। वे रश्मियां अर्थात् फील्ड रश्मियां दोनों संयोज्य कणों को कोई हानि नहीं पहुंचाती हैं, बल्कि वे उन कणों को उस समय तरंग के समान कम्पित (Vibrate)अवश्य करती हैं। इस Vibration में प्राण नामक प्राण रश्मियां, जो धनावेशित कणों से उत्सर्जित होती हैं, कणों के मध्य सूक्ष्म रूप में विद्यमान Dark Energy पर प्रहार करके उसे सर्वथा क्षीण करके आकाश में मिला देती हैं। इससे वह संयोग प्रक्रिया में बाधा नहीं पहुंचा सकती।

 

मेरा आध्यात्मिक भाष्य

 

(त्वं=सारमेय) योग साधना में प्रवृत्त मनुष्य के साथ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा तथा स्मृति नामक पांच वृत्तियां (सूकरस्य) साधक को शीघ्रतापूर्वक अपने प्रभाव से आच्छादित करने वाले पंच क्लेशों= अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश, को बढ़ाती हैं, तथा (तव) उन पांच वृत्तियों को (सूकरः) वे पंच क्लेश भी समृद्ध करते हैं। (स्तोतृनिन्द्रस्य) इन्द्र अर्थात् परमैश्वर्यवान् परमेश्वर के स्तोता= साधक को ये वृत्तियां एवं क्लेश {रायसि= गच्छसि -सायणभाष्य} योग साधक के चित्त को क्यों चंचल बनाती हैं? इसका उत्तर यह है (दुच्छुनायसे) कि इससे योगपथ का पथिक मनुष्य उन दुष्ट वृत्तियों व क्लेशों के प्रभाव में बहता हुआ (नि षु स्वप) उस साधना से नितराम् उपरत हो जाता है। इस कारण योग साधक को चाहिए कि वह इन दोनों अर्थात् वृत्तियों व क्लेशों को सतत अभ्यास व सम्यक् ज्ञान के द्वारा नियन्त्रित व निर्मूल करके उन्हें प्रसुप्तवत् बनाने का प्रयत्न करता रहे।

 

भावार्थ- जब कोई योगसाधक योग मार्ग पर अग्रसर होता है, तब प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति नाम वाली पांच वृत्तियां तथा अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश नाम वाले पांच क्लेश उसके मन को बार-2 अस्थिर करने लगते हैं। इससे योगाभ्यासी अपने पथ से उपरत होने लगता है। इस कारण योगाभ्यासी को चाहिए कि वह इन वृत्तियों व क्लेशों से दूर रहने का धैर्यपूर्वक निरन्तर प्रयत्न करता रहे, जिससे उसकी योगमार्ग में प्रवृत्ति सतत बनी रहे।

 

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक  

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