वेद संसार के सबसे प्राचीन एवं सनातन ग्रन्थ हैं। इन्हें समझने के लिए प्राचीन ऋषियों ने इनके व्याख्यान रूप अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ, ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की। इनमें ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ महर्षि ऐतरेय महीदास जी द्वारा लगभग 7000 वर्ष पूर्व रचा गया, इसका नाम ऐतरेय ब्राह्मण है। यह ब्राह्मण ग्रन्थ सबसे प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थ है। ब्राह्मण ग्रन्थों की भाषा अति जटिल व सांकेतिक होने से ये ग्रन्थ सदैव रहस्यमय रहे। देश व विदेश के कुछ भाष्यकारों ने इनकी कर्मकांडपरक व्याख्या की। श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक ने इस ग्रन्थ का संभवतः विश्व में प्रथम बार वैज्ञानिक भाष्य किया है। इस भाष्य का नाम ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ है, जो चार भागों में 2800 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है।


‘वेदविज्ञान-आलोकः’ ग्रन्थ वैदिक विज्ञान संबंधी साहित्य का एक अति महत्वपूर्ण व क्रांतिकारी ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में Cosmology, Astrophysics, Quantum Field Theory, Plasma Physics, Particle Physics and String Theory जैसे अति महत्त्वपूर्ण एवं गंभीर विषयों का विशद विवेचन है। वर्तमान सैद्धांतिक भौतिकी पिछले लगभग 50 वर्ष से विशेष कठिन दौर से गुजर रही है। भौतिक अनुसंधान के क्षेत्र में अनेक बाधाएँ व समस्या खड़ी हुई हैं। Higgs Boson एवं ग्रेविटेशन वेव्स, जिनकी परिकल्पना भी इन 50 वर्षों से पूर्व ही की गई थी, को छोड़कर अन्य कोई विशेष अनुसंधान नहीं हो पाया है। वैसी स्थिति में यह ग्रन्थ वर्तमान सैद्धांतिक भौतिकी के लिए बहुत सहायक होगा।


स्पेस, टाइम, मूल कणों एवं फोटोन की उत्पत्ति व संरचना, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी, ग्रेवीटोन व अन्य फील्ड पार्टिकल्स की उत्पत्ति, ग्रेवीटोन की संरचना, रेड शिफ्ट व CMB Strings का कारण, द्रव्यमान व ऊर्जा का स्वरूप व उत्पत्ति, विद्युत् आवेश का स्वरूप व उत्पत्ति, विभिन्न मूल बलों की उत्पत्ति, स्वरूप एवं विस्तृत क्रियाविज्ञान, तारों व गैलेक्सियों की उत्पत्ति की विस्तृत प्रक्रिया, गैलेक्सी में तारों की कक्षाओं का निर्माण, ब्रह्मांड की मूल अवस्था, सृष्टि उत्पत्ति की विस्तृत प्रक्रिया, जो मूलकणों व फोटोन की उत्पत्ति से कई चरण पूर्व से प्रारम्भ होती है, भौतिक विज्ञान के इन अनेक गम्भीर व मौलिक विषयों की इस ग्रन्थ में विस्तृत व्याख्या की गई है। इन विषयों में वर्तमान सिद्धांतिक भौतिकी जहाँ-जहाँ गम्भीर व अनसुलझी समस्याओं में फंसी है, उनका तर्कसंगत एवं विस्तृत समाधान इस ग्रन्थ में आचार्य अग्निव्रत ने किया है।


आधुनिक भौतिकी के इन सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषयों के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में ईश्वर के अस्तित्व की अनिवार्यता, उसके स्वरूप तथा उसके द्वारा सृष्टि रचना, संचालन व प्रलय के क्रियाविज्ञान को बड़े ही अद्भुत ढंग से समझाया गया है। इस आध्यात्मिक विज्ञान का भौतिक विज्ञान से समन्वय व सम्बंध आश्चर्यजनक है। ईश्वर के क्रियाविज्ञान अर्थात् उसके कार्य करने की प्रणाली को समझ कर आधुनिक सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिकों को सृष्टि को गहराई से समझने में सहयोग मिलेगा। और उनकी अनेक समस्याएं स्वतः ही दूर हो सकेंगीं।


इस ग्रन्थ में वैदिक श्रौत यज्ञों की परम्परा का सृष्टि विज्ञान के साथ सम्बंध सिद्ध होकर उन यज्ञों का वैज्ञानिक प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा। इससे याज्ञिक विद्वानों को यह बोध हो सकेगा कि प्राचीन सनातन वैदिक यज्ञ ब्रह्माण्ड में विज्ञान को समझाने के लिए मानचित्र के समान हैं। यह कार्य वैदिक यज्ञ परम्परा के पुनरुद्धार के लिए अति महत्वपूर्ण होगा।


इस ग्रन्थ में वेद के वैज्ञानिक स्वरूप की विवेचना आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक की एक अति महत्वपूर्ण खोज है। आपने इस ग्रन्थ में बड़े तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक ढंग से यह सिद्ध किया है कि वैदिक ऋचाएं वस्तुतः सृष्टि के मूल उपादान पदार्थ में उत्पन्न कम्पनों का ही रूप हैं, जो वाणी के परा, पश्यन्ती रूप में प्रकट होती हैं। इसमें बताया गया है कि वैदिक ऋचाएं अति सूक्ष्म कम्पित पदार्थों का रूप हैं। आधुनिक भौतिकी जिन स्ट्रिंग्स द्वारा मूल कणों के निर्माण की बात करती है, वस्तुतः वैदिक मंत्र उन Strings से भी सूक्ष्म कम्पित पदार्थ हैं। इन कम्पित पदार्थों के गुणधर्म, उनकी उत्पत्ति का क्रियाविज्ञान, उनके द्वारा सृष्टि कैसे बनती व संचालित होती है, मूलकणों से लेकर तारों तक सभी पदार्थ इनसे कैसे बनते व अपने सभी कार्य करते हैं, यह सब दर्शाना इस ग्रन्थ की महत्वपूर्ण व अद्वितीय विशेषता है।


इस ग्रन्थ की पूर्वपीठिका जो 420 पृष्ठ की है, में वर्तमान सृष्टि उत्पत्ति विज्ञान की समीक्षा करते हुए वैदिक सृष्टि उत्पत्ति की व्याख्या की गई है। इसमें वेद व ब्राह्मण ग्रन्थों के भाष्य करने की वैज्ञानिक पद्धति, जो व्याख्याकार की दृष्टि में महाभारत काल के पश्चात् लुप्त हो गई थी, को ईश्वर कृपा व आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती के संकेतों की सहायता से खोजा है। इसमें वेद आदि ग्रंथों के अन्य भाष्यकारों के भाष्य से अपने भाष्य की तुलना करने के लिए कुछ वेद मंत्रों का तीन प्रकार की शैली से भाष्य भी उदाहरण के रूप में दर्शाया है।


महाभारत काल के पश्चात् वैदिक धर्म जिन सामाजिक व धार्मिक बुराइयों से ग्रस्त हो गया था, उन सबका उन्मूलन भी इस ग्रंथ को समझने से संभव हो सकेगा। इस प्रकार हमारा भारत मध्य काल से लेकर अब तक जिन सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त रहा व है तथा जो वेद आदि शास्त्र को न समझने अथवा उन्हें मिथ्या ढंग से समझने से उत्पन्न हुई थीं, को दूर करने में भी यह ग्रन्थ दूरगामी लाभ देगा।


इस ग्रन्थ में चारों वेद, विभिन्न ऋषियों के लगभग 68 ग्रन्थों एवं अन्य संस्कृत ग्रन्थों सहित कुल 94 ग्रन्थों के अतिरिक्त आधुनिक भौतिकी के लगभग 30 उच्च स्तरीय ग्रंथों को उद्धृत किया गया है।


संक्षिप्त में यह ग्रन्थ भारत के प्राचीन वैदिक ज्ञान विज्ञान को सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हितकारी सिद्ध करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह आधुनिक भौतिकी को एक नई दिशा देकर भारत को वास्तव में सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में जगद्गुरु बना सकेगा। यह ग्रन्थ हिंदी भाषा में है। श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक के शिष्य श्री विशाल आर्य, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी में M.Sc. की है, ने इस ग्रन्थ का संपादन किया है। श्री वैदिक स्वस्ति पंथा ट्रस्ट, भागलभीम, भीनमाल, जिला जालोर, राजस्थान, जिसके अध्यक्ष श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक हैं, ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित किया है।


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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