मित्रों हमारी भोगवादी जीवनशैली आज पर्यावरण तंत्र को नष्ट करके इस पृथ्वी को प्राणविहीन करने की ओर अग्रसर है। आज हम इन पांच प्रकार के प्रदूषण से ग्रस्त हैं -


(1) भूमि प्रदूषण - बढ़ता कचरा प्लास्टिक ई- वेस्ट रासायनिक खाद, कीटनाशक रसायन, फल​,​ शाक व अन्न के संरक्षक रसायन अनेकों दुष्प्रभाव वाली अंग्रेजी दवाइयां आदि अनेक प्रकार के विष भूमिमाता के शरीर को विषैला बना रहे हैं। (2) जल प्रदूषण - भूमिगत जल, नदियां, झरने, तालाब ही नहीं अपितु महासागरों एवं वृष्टि जल भी प्रदूषित होकर नाना रोग उत्पन्न कर रहा है। वनस्पतियों पर भी इसका दुष्प्रभाव हो रहा है। (3) वायु प्रदूषण - विभिन्न उद्योगों, उर्वरक व कीटनाशक संयंत्र एवं वाहनों से उत्पन्न विषैली गैसें हम सब के लिए खतरा बन चुकी हैं। (4) विकिरण व स्पेस प्रदूषण - वायु प्रदूषण के कारण ओजोन की क्षीण होती परत, इसके कारण सूर्य से पराबैंगनी विकिरणों की घातक प्रचुरता, सूचना तकनीक के नाना साधनों से उत्पन्न नाना प्रकार की तरंगों ने संपूर्ण स्पेस को प्रदूषित कर दिया है। आज जिससे हम अति उत्साहित हैं, वह सूचना तकनीक शीघ्र ही विश्व को नष्ट कर देगी। (5) मनस्तत्व प्रदूषण - मांसाहार हेतु पशु-पक्षी की हत्या, मछलियों की हत्या व अन्य प्रकार की हिंसा से उत्पन्न पैन वेव, अतिकामुकता, ईष्या, क्रोध, लोभ, तृष्णा, मिथ्यापन, द्वेष, शोक आदि से उत्पन्न नकारात्मक तरंगे उपर्युक्त सभी प्रकार के प्रदूषणों से अधिक घातक हैं। मेरा विश्वास है कि आगामी लगभग 50 वर्ष के पश्चात वैज्ञानिकों को इस कटु सत्य का बोध होगा । मनस्तत्व का प्रदूषण ही अन्य प्रदूषणों का जनक है ।

इन पांच प्रदूषणों के चलते मानव जाति ही नहीं अपितु प्राणी जगत का अस्तित्व संकट में है और मनुष्य इनसे अनजान बना निरंतर काल के गाल की ओर अग्रसर हैं।


इन प्रदूषणों के निवारण का संक्षिप्त उपाय -

(1) जीवन शैली बदलें, प्राचीन खान-पान व जीवन शैली अपनाएं। आवश्यकता कम करें। गो-आधारित कृषि अपनाएं। (2) भूमि व वायु प्रदूषण दूर करने से ही इन प्रकार के प्रदूषण पर नियंत्रित किया जा सकता है। नदियां, झरनों व तालाब की सफाई पर विशेष ध्यान दें। (3) अधिकाधिक वृक्षारोपण, गोधृत व वनस्पतिक जड़ी बूटियों से नियमित यज्ञ। विलासिता की सामग्री का उपयोग न करें। प्राकृतिक व आयुर्वेदिक चिकित्सा के साथ बायो कृषि से वायुप्रदूषण के कारणों पर नियंत्रण होगा । (4) सूचना तकनीक, फ्रिज, ए. सी. आदि का कम से कम उपयोग करें। संभव हो तो इनका उपयोग केवल आपत्ति काल में ही करें। (5) ईश्वर के सच्चे स्वरूप व उसकी सच्ची साधना करके काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष व हिंसा की तरंगों को बनने से रोकें। प्रेम, करुणा, सत्य आदि की सकारात्मक तरंगों का समृद्ध करें। मांस, अंडा, मछली न खाए और न कभी किसी को खिलाएं।


इन पांच उपायों से हम धरती को बचाने में सफल हो सकते हैं। आवश्यकता है स्वयं को बदलने की अनुकरणवृति का त्याग करके विवेकपूर्ण जीवन जीने में। आइए, हम मनुष्य हैं मनुष्यता का व्यवहार सीखें अथार्त् प्रत्येक कार्य सत्य- असत्य व हित- अहित को विचार करके ही करें और 'जियो और जीने दो' की सुखद राह पर चलें।​​


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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