आज ​के ​​​यशस्वी​​​ सुपठित ​व्यक्ति एवं विद्वान्​ राजनेता ज​ब ​भारत की बात करते हैं, ​तब ​वे वास्तव में यथार्थ भारत को भूल ही जाते हैं। ​जब भारतीय इतिहास ​व ​संस्कृति की चर्चा में उस चक्रवर्ती ​सम्राट् भारत का नाम भी नहीं लेते,​ जिनके नाम से यह देश भारत। इससे पूर्व इस भूभाग का नाम ​आर्यावर्त था​,​ जिसके प्रथम सम्रा​ट् इक्ष्वाकु ​थे। ​इ​न​का नाम कोई नहीं लेता ​वा ​जान​​। ​इसके वंशज हरिश्चंद्र​,​ भगीरथ​,​ दिलीप​,​ सगर​,​ रघु​, ​राम सबको भूल जाते हैं। महर्षि दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में अनेक चक्रवर्ती सम्राटों के नाम दिए। ​भारत की बात करने वाले वशिष्ठ​,​ विश्वामित्र​,​ भरद्वाज​,​ अगस्त्य​,​ वाल्मीकि​,​ परशुराम​,​ महादेव​,​ ब्रह्मा​,​ विष्णु​,​ ​इन्द्र,​ ​भृगु, मनु​,​ कपिल, कणाद, गोतम​,​ पतंजलि​,​व्यास​,​ ​पाणिनी, महिदास, ​नारद​,​ ​​सनत्कुमार जैसे महान ​ऋषियों ​की चर्चा तक नहीं करते। ​ ​वे श्रीकृष्ण​,​ युधिष्ठिर​,​ अर्जुन​,​ विदुर​,​ चाणक्य को भी नहीं स्मरण करते। ​माताओं में सीता, सावित्री, उमादेवी, अनसूया, अपाला, लोपामुद्रा,गार्गी, कुंती, पद्मिनी व जीजाबाई का भी नाम नहीं लेते। भला ऐसे महामान​वों ​ के बिना क्या भारत वास्तव में भारत है ?


​यह संतोष की बात है कि ​वे चन्द्रगुप्त मौर्य​,​ अशोक​,​ ​गो​त​​म बुद्ध​ का नाम स्मरण है परंतु वे शंकराचार्य​ जैसे योगी​,​ आर्यभट्ट​,​ वराहमिहि​रि, ​भास्कराचार्य​,​ ब्रह्म​गुप्त, ​नागार्जुन​,​ सुश्रुत जैसे मध्यकालीन वैज्ञानिकों को भूल जाते हैं। उन्हें मुगल ​व ​अंग्रेज​ तो स्मरण हैं परंतु इन​के ​खूंखार कारनामे स्मरण नहीं। ​इनके अत्याचारों के विरुद्ध नाना ​कष्ट सहने ​​​वा बलिदान देने वाले राणा सांगा​,​ प्रताप​,​ शिवाजी​,​ गुरु गोविंद सिंह​,​ सूरजमल​,​ बंदा बैरागी​,​ गुरु तेग बहादुर का नाम स्मरण नहीं है। ​उन्हें गांधी​, ​नेहरु का नाम ​ध्यान है परंतु​ ​नाना​ ​साहब​,​ रानी लक्ष्मी बाई​,​ मंगल पांडे​,​ तात्या टोपे​,​ कुंवर सिंह​,​ झलकारी बाई​,​ बिरसा मुंडा​​ कहां याद रहे हैं​? स्वामी श्रद्धानंद​,​ स्वामी कृष्ण वर्मा​,​ सावरकर​,​ सुभाष चंद्र बोस​,​ लाला लाजपत राय​,​ भगत सिंह​,​ चंद्रशेखर आजाद​,​ राम प्रसाद बिस्मिल​,​ रोशन सिंह​,​ राजगुरु​,​ सुखदेव​,​ उधम सिंह उनके लिए कोई महत्व नहीं रखते। राजा राममोहन राय तथा स्वामी विवेकानंद देश के लिए नहीं लड़े और न​ इन ​दोनों ही सुधारकों ने अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध कुछ कहा ​वा ​लि​खा, ​फिर भी ​ये ​सबको याद ​हैं ​ परंतु महर्षि दयानंद​, ​जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में सर्वप्रथम स्वराज शब्द का प्रयोग किया तथा जिस ग्रंथ को पढ़कर कितने ही क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े​,​ ​वे ​महर्षि दयानंद किसी को भी याद नहीं आते हैं। ​जिन्होंने सर्वप्रथम​ '​आर्यावर्त (भारत) देश के सदृश भूमण्डल में अन्य कोई देश नहीं है', 'कोई कितना ही करे, स्वदेशी राज्य सर्वोपरि उत्तम होता है' ​ना​रे ​उस​​ समय देशवासियों को दि​ये, ​जब कोई ऐसा सोचता​​ भी नहीं था​,​ उन्हें कभी राष्ट्र याद नहीं करता। ​


भला ​इन ​ऋषि​यों, ​देवों, महान ​राजाओं, ​​ वैज्ञानिकों​,​ वीर बलिदानियों व स्वतंत्रता सेनानियों के अतिरिक्त अन्य अनेक ​वीरों व तपस्वियों की कृतज्ञता व्यक्त ​ कि​​ए बिना क्या भारत भारत रहेगा ? ​स्मरण रहे भारत की पहचान उसकी अपनी वैदिक संस्कृति व सभ्यता​,​ जो वास्तव में ​ब्रह्मांडीय व शाश्वत ​ज्ञान वेद ​पर आधारित है। शुद्ध मनुस्मृति​,​ उपनिषद​,​ दर्शन​,​ रामायण​,​ महाभारत​,​ ब्राह्मण ग्रंथ आदि इस भारत की पहचान ​हैं। ये सभी महापुरुष​ एवं इनके अतिरिक्त अनेकों वीर एवं तपस्वी पुरुष एवं सती-वीरांगना नारियां ​भारत की पहचान ​हैं।


दुर्भा​​ग्य से आज यह पहचान ​धुंधली ​ हो गई ​व मिट ​गयी है। इसका कारण प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन का अभाव ही है। ​एक कारण यह भी है कि अपने अनेक पूर्वजों को परमात्मा का अवतार​ व ​ परमात्मा घोषित करके ऐतिहासिक सीमा प​रे ​धकेल दिया है​,​ तब उन्हें कौन भारत की पहचान मानेगा ? इसके साथ प्यारे परन्तु अभागे देश के यशस्वी व्यक्तियों का भी बौद्धिक व नैतिक स्तर ऐसा नहीं रहा, जो इन महान पूर्वजों की महानता तथा वेदादि शास्त्रों की वैज्ञानिकता को समझ सकें। आज उन्हें ही महापुरुष माना जाता है, जिनके नाम पर अधिक वोट मिल सकते हैं, तब न्याय व विज्ञान का सिद्धांत इस भीड़तंत्र व सत्तालोलुपत्ता में कैसे टिकेगा? जागो भारत​!​ ​


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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