1. नित्य ही मिथ्या भाषण करे। एक ही झूंठ को नित्य दोहराए। 2. जाति व मजहब के मुद्दे नित्य उठाते रहकर जनता को सदैव बांटता रहे। 3. सत्तापक्ष में रहकर खूब लूटे तथा सत्ता से बाहर होते ही जनता को दिवास्वप्न दिखाने में चतुर हो। 4. किसी भी हत्या, आत्महत्या वा दुर्घटना पर तुरन्त आक्रामक राजनीति करने मेेें दक्ष हो। 5. चुनाव जीतते ही अपार सम्पत्ति जुटाने की कला में प्रवीण हो। 6. किसान, दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक, मजदूर आदि के नाम पर देश में अराजकता फैलाने में जिसे किन्न्चित् भी लज्जा न आवे। 7. स्वयं को सदैव सर्वज्ञ व धर्मात्मा तथा दूसरे को मूर्ख व पापी समझे औेेेर ऐसे ही भाषण देने में दक्ष हो। 8. राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति हेतु देश को कमजोर करने एवं इसके लिए शत्रु देश के नेताओं से भी मित्रता करने, देश की सेना में अविश्वास जताने और देश को बेचने में भी कभी कोई शंका न करे। 9. भ्रष्टाचार का आरोपी अथवा अभियुक्त होकर भी ईमानदारी व देशसेवा पर ओजस्वी भाषण देता फिरे। 10. चुनाव निकट आने पर सत्ता प्राप्ति हेतु हर हथकण्डा अपनाने का प्रयास करते हुए देश में अशान्ति व भय का वातावरण उत्पन्न करने में कुशल हो। 11. चुनाव जीतने के लिए विदेशों से प्रेरित वा नियंत्रित कथित धर्मगुरुओं से फतवे जारी कराने का प्रयास करे।

जब ऐसे नेताओं की भरमार देश में हो जाए, तब समझना चाहिए कि अब राजनीति निर्लज्ज व अति घृणित स्तर की हो चुकी है। तब देश गंभीर संकट की ओर बढ़ रहा है।

ऐसे में देश को चाहिए कि वह नेताओं के चरित्र व कार्यां का विवेक के साथ आकलन करे, प्रलोभनों में न फंसे और राष्ट्र के हित को ही सर्वोपरि माने।


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक



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