तथाकथित हाई प्रोफाइल साधुओं के दुराचार की श्रंखला निरन्तर बढ़ रही है। वेदविहीन विद्वान् एवं विषयलम्पट लोग आज ऐसे ही साधुता का ढोंग कर रहे हैं, जैसे कभी रावण ने भगवती सीताजी के हरण के लिए किया था। दुर्भाग्य से प्यारे देश में ऋषियों की बातों का अनुकरण नहीं किया, जिनमें यह कठोर निर्देश था कि पांच वर्ष की कन्या भी पुरुष वर्ग से दूर रहे और पांच वर्ष का बालक भी महिलाओं से दूर रहे। सहशिक्षा की तो बात स्वप्न में भी सम्भव नहीं थी परन्तु अनार्ष वा पाश्चात्य शिक्षा के अंधे प्रवाह ने सब चौपट कर दिया। सभी स्वच्छन्द हो गये, जो साधु बन कर ज्ञान, भक्ति, योग व चरित्र की शिक्षा देते हैं, वे भी ऋषियों के आदेशों की धज्जियां उड़ाकर कन्याओं व युवतियों को शिक्षा-दीक्षा देते हैं, उनसे चरण वन्दन कराते हैं, पैर दबवाते हैं। एकान्त में चर्चा करते हैं। ऐसे पाप कर्म करने वालों का चरित्र कब तक सुरक्षित रह पायेगा?


वस्तुतः जो साधु, चाहे वे ब्रह्मचारी हों, गृहस्थ वा संन्यासी सबके चरित्र की सघन जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही महिला वर्ग को भी चाहिए कि वे श्रद्धा व अन्ध श्रद्धावश पुरूष साधुओं से दूर रहें। यदि वे कुछ अच्छा उपदेश करते हैं, तो दूर से ही सार्वजनिक रूप से सुन लें। यदि वे उन्हें बुलाएं, निकट आने को बाध्य करें, प्रलोभन दें, तो तुरन्त ऐसे साधुओं से दूर हो जायें और उनकी तत्काल पुलिस को सूचना दें, अन्यथा यह पापपूर्ण खेल यूं ही चलता रहेगा। सरकार को चाहिए कि साधुओं की भाँति मुल्ला-मौलवियों व पादरियों की भी ऐसे ही गुप्त जांच निरन्तर होवे। इसमें पक्षपात नहीं होने पाये।


साधुओं की पहचान उनके धन, मिथ्या चमत्कार, आडम्बर एवं यश से नहीं होनी चाहिए बल्कि तप, त्याग, सरलता, विद्या एवं सादगी ही सच्चे साधु की पहचान होती है। आज के हाइ प्रोफाइल कथित साधुओं में वे लक्ष्ण मिलना कठिन ही है।


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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