ईर्ष्या ऐसा गम्भीर रोग है, जो मनुष्य के न केवल तन अपितु अन्तःकरण व आत्मा को भी खा जाता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने अवगुणों व अयोग्यता तथा दूसरों के गुणों व योग्यता को कभी नहीं देख पाता। वह न केवल पराया अपितु अपना भी विनाश कर लेता है। वह दूसरों के इस लोक को नष्ट करने के प्रयास में अपने दोनों लोकों को नष्ट कर बैठता है, परन्तु उसे इसका आभास भी नहीं होता। इतिहास में दुर्योधन का विनाश इसका ज्वलन्त उदाहरण है। वर्तमान में चतुर्दिक ईर्ष्या, द्वेष व कटुता का वातावरण आर्य समाज, हिन्दू समाज, भारतवर्ष ही नहीं अपितु विश्व मानवता के लिए भी खतरे की घंटी है।


मेरे मित्रो! सावधान! परमात्मा की सच्ची उपासना एवं प्राचीन ऋषियों व वेदों की गहरी समझ व विश्वास ही हमें इस महारोग से बचा सकता है।


आयें, हम दूसरों को हराने व नीचा दिखाने के स्थान पर अपने ईर्ष्या, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं को हराने व मिटाने का व्रत लें तथा जो भी वेद, राष्ट्र वा मानवता की सेवा सदाचारपूर्वक कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने मेें सहयोग करें। यदि सहयोग न कर सकें, तो उसका विरोध तो न करें।


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक