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वैदिक धर्मो विजयते = मानवता विजयते


स्वामी अग्निवेश (वस्तुतः कामरेड नेता श्री अग्निवेश) पर हमला किसने किया? यह हमला प्रतिक्रिया- वश हुआ अथवा जानबूझकर, यह सब जाँच का विषय है। मैं तो इतना ही कहना चाहूंगा कि भीड़ को कानून अपने हाथ में लेना उचित नहीं है। यदि ऐसा होने लगा तो, देश में अराजकता फैल जायेगी। इसके साथ ही मैं यह भी कहूंगा कि स्वामी अग्निवेश का आर्य समाज के सिद्धान्तों से कोई लेना देना नहीं है। वे नितान्त मार्क्सवादी व्यक्ति हैं। उन्हें हिन्दू पाखण्ड तो दिखाई देते हैं परन्तु इस्लाम व ईसाई मत के पाखण्ड एवं कम्युनिष्टो की राष्ट्रविरोधी मानसिकता उन्हें कभी दिखाई नहीं देती। इस कारण वे नाना पापों के समर्थन में कुछ न कुछ बयान देते रहते हैं। जो महानुभाव उन्हें आर्यनेता मानते हैं, मैं उनसे बड़ी विनम्रता से जानना चाहता हूँ कि-

1. कश्मीरी अलगावादियों का समर्थन व धरना 2. आतंकवादियों को फांसी देने का विरोध 3. समलैंगिकता का समर्थन 4. वेद को कुरान के समकक्ष मानना 5. सदैव हिन्दुत्व का विरोध और इस्लाम व ईसाईयत पर मौन किंवा उनका समर्थन 6. भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले देशद्रोहियों का समर्थन 7. बिग बॉस में जाना 8. आतंकवादियों व नक्सलियों द्वारा नागरिकों तथा सुरक्षाकर्मियों की हत्याओं पर मौन 9. गोहत्या व गोमांस भक्षण का परोक्ष समर्थन 10. मौलवियों, पादरियों व नास्तिक कम्युनिष्टों से मित्रता एवं हिन्दू आचार्यों वा साधुओं का तीव्र विरोध


आदि अनेक बिन्दु क्या ऋषियों के हृदय में शूल चुभोने वाले नहीं हैं? क्या ये ऋषिदयानन्द व राष्ट्र के आत्मा को घायल करने वाले नहीं हैं? क्या ऐसे व्यक्ति को आर्य समाजी अथवा हिन्दू संन्यासी मानना चाहिए? क्या इस विचारधारा वाले व्यक्ति को भगवे वस्त्र धारण करने चाहिए? विचारें! हम कहाँ जा रहे हैं? विवादास्पद एवं देशविरोधी व्यक्तियों को केवल उनके प्रभावशाली अथवा धनपति होने के कारण ही हम आदर्श मानने लगे, तो आर्य समाज तो क्या, भारत ही मिट जाएगा। दुर्भाग्य से आज महर्षि दयानन्द जी महाराज को ये लोग न पढ़ते हैं और जो पढ़ते हैं, उनमें से अनेक उन्हें समझते नहीं है और पढ़ने वा समझने वाले न उस पर आचरण करते हैं। इसी कारण कभी देश को नयी दिशा देने वाला आर्य समाज खण्ड-खण्ड हो रहा है। जो सच्चे व ऋषिभक्त आर्य समाजी हैं, उन्हें मूल्यों को कभी त्यागने का विचार भी नहीं करना चाहिए।


हमें वेद तथा उसके पश्चात् महर्षि ब्रह्माजी महाराज से लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती तक ऋषियों की आदर्श परम्परा पर ही चलना चाहिए, न कि आज के किसी लोकैषणा से ग्रस्त व्यक्ति के पीछे चलना चाहिए, अन्यथा हम सब कुछ खो देंगे। यह बात तो सत्य है कि पाखण्ड का सदैव विरोध होना चाहिए तथा हिन्दुओं को भी यह बात समझनी चाहिए कि भारत एवं कथित हिन्दू-जाति का सर्वनाश पाखण्डों व अन्धविश्वासों व जातिवाद आदि पापों के कारण ही हुआ है। उधर पाखण्ड का खण्डन करने वाला हिन्दुओं का शत्रु बनकर खण्डन न करे, बल्कि हितभावना के साथ असत्य का खण्डन करते हुए सत्य मार्ग भी अवश्य बताए। उधर इस्लाम, ईसाई आदि की विवेचना भी निष्पक्ष व मानवता के कल्याण तथा वैदिक सत्यधर्म की स्थापना की दृष्टि से ही करनी चाहिए। हमें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि मानवता की ही जय होनी चाहिए, न कि किसी मजहब वा जाति की। यह जय केवल पारस्परिक संवाद से सत्य की खोज से ही होगी। हमारे मत में वेद ही सत्य स्रोत हैं एवं ये ही सनातन व पुरातन होने के साथ सम्पूर्ण ज्ञान का भी स्रोत हैं। कोई इस पर शंका करे, तो मैं संवाद के लिए तत्पर हूँ।


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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