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#भगवान्_महादेव_शिव_उपदेशामृत (7)


शूद्र का धर्म


शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु।। 57।। स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः। शुश्रूषुरतिथि प्राप्तं तपः संचिनुते महत्।। 58।।


शूद्र का परम धर्म है तीनों वर्णों की सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घर पर आये हुए विद्वान् अतिथि की सेवा करने वाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है।। 57-58।।


नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः। शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान्।। 59।।


नित्य सदाचार का पालन और ईश्वरभक्त तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य का सम्मान करने वाला बुद्धिमान् शूद्र धर्म का मनोवाच्छित फल प्राप्त करता है।। 59।।


(महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 141, गीताप्रेस )


वेद व भगवान् मनु के मतानुसार श्रमिक को शूद्र कहा गया है। शूद्र का अर्थ अछूत व अधर्मी कभी नहीं रहा। वर्ममान विश्व में श्रमिक वही कर्म करता है, जिसका विधान यहाँ है। हां, शास्त्रों में शूद्र अर्थात् श्रमिक को अधिक सभ्य, शिक्षित व संस्कारी माना गया है। शिवभक्त श्रमिक विचार करें-


⚫ क्या वे मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करते हैं?

⚫ क्या वे अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले हैं?

⚫ क्या वे अपना कार्य निष्ठापूर्वक करते हैं?

⚫ क्या वे अपने स्वामी के प्रति सम्मान का भाव रखते हैं?

⚫ क्या वे ईश्वरभक्ति के साथ-2 यज्ञादि कर्मों व वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा रखते हैं?


यदि नहीं, तो वे शिवभक्त कहाने योग्य नहीं हैं।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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