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#भगवान्_महादेव_शिव_उपदेशामृत (6)


वैश्य का धर्म


वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा। अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च।। 54।।

वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः। विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मःसनातनः।। 55।।


पशुओं का पालन करना, खेती, व्यापार, अग्निहोत्र में सदैव विशेष सक्रिय रहना, दान, अध्ययन, सदाचार में सदैव स्थित रहना, विद्वान् अतिथि सत्कार, मन व इन्द्रियों को सदैव वश में रखना, वेदज्ञ ब्राह्मणों का स्वागत और त्यागभावना से धन का उपभोग करना, ये सब वैश्यों के सनातन धर्मं हैं।। 54-55।।


सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यर्थाहतः।। 56।।


त्रिवर्ग अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं शूद्र, इन तीनों वर्णों का प्रत्येक वैश्य को सब प्रकार से यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ।। 57।। ( महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 141, गीताप्रेस )


वर्तमान में उद्योगपति, व्यापारी, कृषक व पशुपालन व मिस्त्री आदि कर्मों को करने वाले वैश्य वर्ग में माने जायेंगे, बशर्ते उनमें उपर्युक्त गुण भी हों। अब ऐसे सभी महानुभाव शिवभक्ति करने के साथ विचारें-


⚫ क्या वे सदाचारपूर्वक अर्थात् ईमानदारी से व्यापार व उद्योग करते हैं?

⚫ क्या वे अपने कर्मचारियों को उचित व पर्याप्त वेतन आदि सुविधाओं से सन्तुष्ट रखते हैं?

⚫ क्या वे कर्तव्यभावना से सुपात्रों को दान देते हैं?

⚫ क्या वे अपने मन व इन्द्रियों को वश में रखते वा रखने का प्रयत्न करते हैं?

⚫ क्या वे त्यागपूर्वक उपभोग करते हैं?

⚫ क्या वे राष्ट्र रक्षा व पालन में संलग्न ब्राह्मण, क्षत्रिय व शूद्रों का पालन करते हैं? अर्थात् राष्ट्र को इनके लिए पर्याप्त व उचित कर ईमानदारी से देते हैं?


यदि नहीं तो आपकी शिवभक्ति मात्र दिखावा है और धर्म के नाम पर दिखावा करने से पाप होता है।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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