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#भगवान्_महादेव_शिव_उपदेशामृत (4)


ब्राह्मणों का धर्म


स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः। कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः।। सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः।


वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मण का धर्म है, यह शास्त्र का निर्णय है। वेदों का पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना, ये सभी ब्राह्मण के कर्म हैं। सत्य, मनोनिग्रह, तप, और बाहरी व आन्तरिक पवित्रता, यह उसका सनातन धर्म है।


विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः।।

रस और धान्य(अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मण के लिये निन्दित है। (अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141,गीताप्रेस)


पाठक यहाँ भगवान् शिव के वचनों पर विचारें तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणादि वर्ण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म व योग्यता से होते हैं। इसका स्पष्टीकरण आगे करेंगे। यहाँ यह चिन्तनीय है कि क्या शिवभक्त कहाने वाला ब्राह्मण आज वेदादि शास्त्रों के महान् ज्ञान विज्ञान को समझता है अथवा भांग पीने में मस्त है? क्या वह दान देना भी जानता है अथवा लेना ही जानता है? क्या वह मनसा वाचा कर्मणा सत्य का पालन व अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला है? क्या वह धर्म के मार्ग में सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी आदि द्वन्दों को सहन करने रूपी तप को करता है? क्या वह मन-वचन-कर्म से पवित्र आचरण करता है? क्या कोई स्वयं को ब्राह्मण अथवा साधु, संन्यासी कहाने वाला व्यापार व उद्योग आदि वैश्य-कर्मों से दूर है? यदि उसमें ये गुण नहीं है, तो वह भगवान् शिव की दृष्टि में ब्राह्मण नहीं हो सकता। आइये, कथित ब्राह्मण बन्धुओ! सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करने का व्रत लें।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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