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#भगवान्_महादेव_शिव_उपदेशामृत (3)


धर्म का गृहस्थ स्वरूप


श्रीमहेश्वर उवाच- अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम्। शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः।। 25।।


श्रीमहेश्वरने कहा- देवी! किसी भी जीव की हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियों पर दया करना, मन और इन्द्रियों पर काबू रखना तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान देना गृहस्थ-आश्रम का उत्तम धर्म है।। 25।।


परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम्। अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम्।। 26।। एष प४चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः। देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः।। 27।। (महाभारत अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141)


परायी स्त्री के संसर्ग से दूर रहना, धरोहर और स्त्री की रक्षा करना, बिना दिये किसी की वस्तु न लेना तथा मांस और मदिरा को त्याग देना, ये धर्म के पाँच भेद हैं, जो सुख की प्राप्ति कराने वाले हैं। इनमें से एक-एक धर्म की अनेक शाखाएँ हैं। धर्म को श्रेष्ठ मानने वाले मनुष्यों को चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्म का पालन अवश्य करें।। 26-27।।


भगवान् शिव के इन वचनों पर सभी गृहस्थ शिवभक्त कहाने वाले गम्भीरता से विचारें कि क्या आप सभी जीवों के प्रति दया व प्रेम करते हैं। क्या शिवमंदिरों में अपने ही कथित दलित भाईयों के प्रति आत्मिक प्रेम व समानता का भाव रखते हैं? क्या आप जीवन भर मांस, मछली, अण्डा व सभी प्रकार के नशीले पदार्थों के परित्याग की प्रतिज्ञा करेंगे? क्या आप अश्लील कथाओं, मोबाइल, इण्टरनेट व पत्र-पत्रिकाओं की अश्लीलता से बचने का व्रत लेंगे? क्या आप सभी परायी स्त्रियों के प्रति कुदृष्टिपात से बच पायेंगे? क्या आप सत्य ही बोलते व उस पर आचरण करते हैं? क्या चोरी, तस्करी, रिश्वत, वस्तुओं में मिलावट तथा किसी के अधिकार छीनने की प्रवृत्ति का त्याग करेंगे? तथा अपने जीवन में श्रेष्ठ वेदानुकूल कार्यों में दान व त्याग की भावना जगायेंगे? यदि नहीं तो आपकी शिवभक्ति सर्वथा निरर्थक है, अज्ञानतापूर्ण है।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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