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#भगवान्_महादेव_शिव_उपदेशामृत (2)


भूमिका-2


भगवान् शिव के विषय में प्रायः शिव पुराण की कथा का वाचन होता है, जबकि महर्षि वेद व्यास जी कृत महाभारत को पढ़ने वाले अब रहे ही नहीं। उल्लेखनीय है कि महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित माने जाने अठारह पुराण वास्तव में उनके द्वारा नहीं बल्कि अन्य आचार्यों द्वारा रचे थे और ये ग्रन्थ प्रामाणिक ग्रन्थ की कोटि में नहीं हैं। यद्यपि महाभारत में भी लगभग 95ः भाग ऐसा है, जो महर्षि वेदव्यास जीे के पश्चात् उनके शिष्यों एवं बाद के अनेक अप्रामाणिक विद्वानों ने लिखकर जोड़ दिया है। पुनरपि महाभारत ग्रन्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका के गम्भीर अध्ययन से प्राप्त प्रखर व नीर-क्षीर विवेक से युक्त प्रज्ञा के द्वारा हम किसी भी आर्ष ग्रन्थ को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मेरा ‘वेदविज्ञान-आलोक’ ग्रन्थ भी इस प्रकार के अन्वेषण में परोक्ष सहयोग कर सकता है।


अब हम महादेव भगवान् शिव की चर्चा करते हैं-


महर्षि दयानन्द जी ने अपने पूना प्रवचन में महादेव जी को अग्निष्वात का पुत्र कहा है। अग्निष्वात किसके पुत्र थे, यह बहुत स्पष्ट नहीं है परन्तु वे ब्रह्माजी के वंशज अवश्य हैं। इधर महाभारत में महर्षि वैशम्पायन ने कहा है-


उमापतिर्भूतपतिः श्री कण्ठो ब्रह्मणः सुतः।। उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः।। शान्तिपर्व। मोक्षधर्मपर्व। अ. 349। श्लोक 67 (गीतप्रैस)


यहाँ भगवती उमा जी के पति भूतपति, जो महादेव भगवान् शिव का ही नाम है, को महर्षि ब्रह्मा जी का पुत्र कहा है। इनका पाशुपत अस्त्र विश्व प्रसिद्ध था। इस अस्त्र को नष्ट वाला कोई अस्त्र भूमण्डल पर नहीं था। महाभारत के अनुशीलन से भगवान् शिव अत्यन्त विरक्त पुरुष, सदैव योगसाधना में लीन, विवाहित होकर भी पूर्ण जितेन्द्रिय, आकाशगमन आदि अनेकों महत्वपूर्ण सिद्धियों से सम्पन्न, वेद-वेदांगों के महान् वैज्ञानिक, सुगठित तेजस्वी व अत्यन्त बलिष्ठ शरीर व वीरता के अप्रतिम धनी दिव्य पुरुष थे। वे जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त महाविभूति थे। उनके इतिहास का वर्णन तो अधिक नहीं मिलता परन्तु उनके उपदेशों को हम महाभारत में पढ़ सकते हैं। इस कारण हम इस पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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