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भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (9)


वर्ण परिवर्तन (2)


ज्ञानविज्ञानसम्पन्नः संस्कृतो वेदपारगः। विप्रो भवति धर्मात्मा क्षत्रियः स्वेन कर्मणा।। 45।।


इस प्रकार धर्मात्मा क्षत्रिय अपने कर्म से ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, संस्कारयुक्त तथा वेदों का पारगंत विद्वान् ब्राह्मण होता है।। 45।।


एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजातिकुलोद्भवः। शूद्रोऽप्यागमसम्पन्नो द्विजो भवति संस्कृतः।। 46।।


देवि! इन कर्म फलों के प्रभाव से नीच जाति एवं हीन कुल में उत्पन्न हुआ शूद्र भी शास्त्र ज्ञान सम्पन्न और संस्कार युक्त ब्राह्मण होता है।। 46।।


न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं च संततिः। कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्।। 50।।


ब्राह्मणत्व की प्राप्ति में न तो केवल योनि, न संस्कार, न शास्त्र ज्ञान और न संतति ही कारण है। ब्राह्मणत्व का प्रधान हेतु तो सदाचार ही है।। 50।।


यहाँ सर्वथा स्पष्ट हो गया है कि वर्ण जन्म से नहीं बल्कि कर्म से ही निर्धारित होता है। वेद तथा वेद के पश्चात् इस पृथ्वी का सबसे प्रथम ग्रन्थ मनुस्मृति का भी यही उपदेश है। इस कारण एक ही व्यक्ति अपने वर्ण के कर्तव्यों से भ्रष्ट हो जाने पर वह उस वर्ण से भ्रष्ट होकर अन्य निम्न. वर्ण को प्राप्त हो जाता है तथा एक व्यक्ति अन्य श्रेष्ठ वर्ण की योग्यता अर्जित कर ले, तो वह उस श्रेष्ठ वर्ण को निश्चित ही प्राप्त हो जाता है। दुर्भाग्य से आज कोई भी जन्म के स्थान पर कर्म से वर्ण व्यवस्था अपनाना नहीं चाहता। सब अपने-2 स्वार्थों में फंसे जन्मना जाति व्यवस्था में ही रहना चाहते हैं, जो कि अनुचित है, अधर्म है। आयें, हम महादेव जी के इन वचनों का आदर करते हुए एक सुन्दर वर्ण व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करें, परन्तु इस कार्य में शासन का संरक्षण अनिवार्य है।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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