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भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (12)


स्वर्ग मोक्ष का अधिकारी कौन?

(3)


ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम्। नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः।। 32।।


गाँव या घरके एकान्त स्थान में पडे़ हुए पराये धन का जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं अर्थात् उसका ग्रहण नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं।। 32।।


तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान्। मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः।। 33।।


इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्त में प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियों को मनसे भी उनके साथ अन्याय करने का विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं।। 33।।


शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः। भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नराः स्वर्गगामिनः।। 34।।


जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रों को भी सदा समान हृदय से अपनाते हैं, वे मानव स्वर्ग लोक में जाते हैं।। 34।।


श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः। स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः।। 35।। (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 144, गीताप्रेस)


जो वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता, दयालु, मनसावाचाकर्मणा पवित्र, सत्य का आचरण करने वाले और अपने ही धन से संतुष्ट होते हैं, अर्थात् पराये धन का कभी लोभ नहीं करते, वे स्वर्गलोक में जाते हैं।। 35।।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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