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भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (10)


स्वर्ग (मोक्ष) का अधिकारी कौन? (1)


वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः। कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन।। 7।।


जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी की हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।। 7।।


ये न सज्जन्ति कसि्ंमश्चित् ते न बद्ध्यन्ति कर्मभिः। प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः।। 8।। तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः।


जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसी के प्राणों की हत्या से दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मों के बन्धनों में नहीं पड़ते, जिनके लिए शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।। 9।।


सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु ।। 9।। त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वार्गगामिनः।


जो सब प्राणियों पर दया करने वाले, सब जीवों के विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणों को त्याग देने वाले हैं, वे मनुष्य स्वर्ग में जाते हैं ।।10।।


परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जकाः।। 10।। धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः। (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 144, गीताप्रेस)


जो दूसरों के धन पर ममता नहीं रखते, परायी स्त्री से सदा दूर रहते और धर्म के द्वारा प्राप्त किये अन्न का ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्ग लोक में जाते हैं।। 11।।


क्रमशः....


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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