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ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 9


Stephen Ha​K​Wing​,​ जिन्होंने अपनी ​ पुस्तक​'The Grand Design' में ईश्वर की सत्ता को अपने अवैज्ञानिक ​कुतर्को के द्वारा नकारने का असफल ​प्रयास किया है, वहीं शरीर में जीवात्मा ​की ​ सत्ता को भी ​अस्वीकार करने का ​ असफल प्रयत्न किया ​है | ​ ​वे ​उसमें रोबोट एवं परग्रही जीव में भेद भी करते हैं, पुनरपि परग्रही जीव में स्वतन्त्र इच्छा ​व ​बुद्धियुक्त आत्मा को नहीं मानते। ​यही हठ ​वर्तमान विज्ञान को विनाशकारी भोगवादी मार्ग पर ले जा रही है। वे लिखते हैं​​ How can one tell if a being has free will ​? ​If One encounters an alien​,​how can o​n​​e tell if it is just a robot or it has a ​M​ind of its own​?​ The behavior of a robot ​would be completely determined​,​​ ​unlike that of a being with free will​.​ Thus one could in principle detect a robot as a being whose actions can be predicted​. ​As we ​said in Chapter 2, this may be impossibly difficult if the beings large and complex​.​ We cannot​ even ​solve exactly the equations for three or more particles interacting with each other​.​ Since an alien the size of a human would​ ​contain ​about ​a ​thousand trillion trillion particles even if the a​lien​ were a robot, it would be impossible to sole the equations and predict what it would do​. ​We would therefore have to say that any complex being has free will-not as a fundamental feature, but as an effective theory​,​ admission of our ​in​ability to ​d​o the calculations that would enable us to predict its actions" (The Grand Design- P. 178) यहाँ पाटक विचारें कि यदि Thousand trillion trillion particles ही बुद्धि, इच्छा की उत्पत्ति का कारण हो सकते हैं, तब क्या रोबोट में इतने कण नहीं होते? वह भी उन्हीं मूलकणों से बना है, जि​न​से हमारा शरीर बना है। अणुओं के स्तर पर ही भेद है, अन्यथा लगभग परमाणुओं के स्तर पर कोई भेद नहीं है, मूलकण स्तर पर तो नितान्त समानता है। तब कैसे कणों की संख्या मात्र के कारण भेद को मान लेते हैं और जीव के व्यवहार को केवल इसी आधार पर ​अज्ञेय ​बता देते हैं। आज एक मनुष्य अनेकों स्वचालित रोबोट्स का निर्माण कर सकता है परन्तु क्या अनेकों रोबोट्स मिलकर भी बिना मनुष्य की प्रेरणा व नियन्त्रण के एक मनुष्य तो क्या, स्वयं एक रोबोट का निर्माण भी कर सकते हैं? इस अवैज्ञानिकता व दम्भपूर्ण पुस्तक में जन्म, मरण, इच्छा आदि को जिस प्रकार समझाया है, वह वास्तव में हॉकिंग साहब को वैज्ञानिक के स्थान पर मात्र एक प्रतिक्रियावादी दुराग्रही नास्तिक दार्शनिक के रूप में प्रस्तुत करता है। इसे पढ़कर मेरे मन में इनके प्रति जो सम्मान था, वह लगभग समाप्त हो गया है। उनके प्रत्येक तर्क का उत्तर सरलता से दिया जा सकता है परन्तु इस ग्रन्थ में जीव की सत्ता की सिद्धि आवश्यक नहीं है, पुनरपि यहाँ हम संक्षेप में कुछ विचार कर रहे हैं। रोबोट में इच्छा, ज्ञान, प्रयत्न, द्वेष, सुख व दुःख ये कोई गुण नहीं होते। वह किसी ​मनुष्य ​द्वारा ​ निर्मित व संचालित होता है। उधर कोई भी जीवित प्राणी किसी अन्य ​द्वारा संचालित ​नहीं होता है, बल्कि प्रत्येक कर्म को करने में स्वतन्त्र होता है। आज हॉकिंग साहब ​जैसे ​जो कोई​ वैज्ञानिक इच्छा, ​ज्ञान ​आदि गुणों से युक्त व्यवहार ​की ​कथित व्याख्या ​करके जीवत्मा की सत्ता को नकारने का प्रयास करते हैं, वह वस्तुतः इस प्रकार ही है, जैसे कोई व्यक्ति किसी हलवाई द्वारा बनाये जा रहे व्यजनों की व्याख्या में आग​, ​पानी, आटा​ ,​शक्कर​, ​दूध​, ​घी, कड़ाही​, ​चम्मच आदि ​सबके कार्यों को ​बता रहा हो ​,​इन खाद्य पदार्थों में नाना परिवर्तनों की रासायनिक प्रक्रिया बता रहा हो परन्तु हलवाई की​ ​चर्चा ही न ​कर ​रहा हो, बल्कि उसके अस्तित्व को ही नकार रहा हो। ऐसी कथित वैज्ञानिक व्याख्याएं वास्तव में अवैज्ञानिक व दुराग्रहपूर्ण ही होती हैं।ये ​वैज्ञानिक इसी प्रकार इस सृष्टि की वैज्ञानिक व्याख्या करते समय उसके निर्माता​ , ​नियन्त्र​क ​ ​वा संचालक असीम बुद्धि व बल से संपन्न चेतन ​परमात्मतत्व की उपेक्षा ही नहीं करते, बल्कि उस​के ​ अस्तित्व को ही नकारने में एड़ी से चोटी तक का जोर लगाते हैं। हम निःसन्देह वैज्ञानिकों की इस वैज्ञानिक व्याख्याओं की सराहना करते हैं। निश्चित ही ​वे ​मूल भौतिकी के क्षेत्र में सतत गम्भीर ​अनुसन्धान कर रहे ​ हैं और करना भी चाहिये परन्तु इस सम्पूर्ण उपक्रम में चेतन नियन्त्रक, नियामक तत्व को ​सर्वथा ​ उपेक्षित कर देते हैं। यही कारण है कि विज्ञान वर्तमान मूल भौतिकी की अनेक समस्याओं को आज तक सुलझा नहीं पाया है। इसी कारण विज्ञान की History of the time में भारी त्रुटियां हैं, ​ऊर्जा - ​द्रव्य संरक्षण के भंग होने की समस्या है, ‘क्यों’ व ‘क्या’ जैसे प्रश्नों का उत्तर न मिल पाना समस्या है, वस्तुतः सर्वत्र समस्याएं ही समस्याएं हैं।​ इस सबके लिखने ​का ​अभिप्राय यही है कि ​सम्पूर्ण ​जड़ जगत् में जो भी बल व गति विद्यमान ​है, ​ उस सबके पीछे चेतन ईश्वर तत्व की ही मूल भूमिका है, उधर प्राणियों के शरीर में आत्मा की भूमिका रहती है​ | ​प्रत्येक गतेि के पीछे किसी न किसी बल की भूमिका होती है। केवल बल की भूमिका से गति​ ​यदृच्छया, ​​निष्प्रयोजन एवं अव्यवस्थित होगी परन्तु सृष्टि एक व्यवस्थित​, ​बुद्धिगम्य व सप्रयोजन रचना है, इस कारण इसमें बल के साथ महती प्रज्ञा की भी भूमिका अवश्य है। बल व बुद्धि किंवा इच्छा, ज्ञान आदि का होना केवल चेतन में ही सम्भव है। यही चेतन तत्व ईश्वर कहलाता है। इस तत्व पर विचार करना वर्तमान विज्ञान के ​सामर्थ्य ​ की बात नहीं है, इस कारण वर्तमान वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के साथ-२ दर्शन शास्त्र, जहाँ ईश्वर, जीव रूपी सूक्ष्मतम ​​चेतन एवं प्रकृति, मन​, ​प्राण आदि सूक्ष्मतर जड़ पदार्थों का विचार किया जाता है, पर भी गम्भीर चिन्तन करना चाहिए, इससे वर्तमान भौतिक विज्ञान की अनेक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग मिलेगा ।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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