जब मैं पूछता हूँ कि धन व ऋण वैद्युत आवेशयुक्त कणों के परस्पर निकट आते ही Virtual Particles कहाँ से व क्यों प्रकट हो जाते हैं? तब वैज्ञानिक उत्तर देते हैं कि इसका उत्तर हम नहीं जानते। जहाँ वर्तमान विज्ञान के पास उत्तर नहीं मिलता, वहाँ वैदिक विज्ञान वा दर्शन उत्तर देता है। यह उत्तर वैदिक ऋषियों वा वेद के महान् विज्ञान से मिलेगा, जिसे हम किसी पृथक् पुस्तक में स्पष्ट करेंगे। यहाँ हम कहना यह चाहते हैं कि वर्तमान विज्ञान किसी बल के कार्य करने की प्रक्रिया को बतलाता है, जबकि वैदिक विज्ञान किंवा दर्शन उसके आगे जाकर यह बतलाते हैं कि वह बल की प्रक्रिया क्यों हो रही है और मूल प्रेरक बल क्या है? वहाँ हम यह सिद्ध करेंगे कि सभी जड़ बलों का मूल प्रेरक बल चेतन परमात्म तत्व का बल है। यहाँ वर्तमान विज्ञान न तो हमारे प्रश्नों का उत्तर देता है और न ईश्वर तत्व के मूल प्रेरक बल की सत्ता को ही स्वीकार करता है। यह दुराग्रह किसी भी वैज्ञानिक के लिए उचित नहीं है। उसे या तो समस्याओं का समाधान करना चाहिये अथवा वैदिक वैज्ञानिकों से समाधान पूछना चाहिए। यहाँ हम चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माण्ड में आधुनिक विज्ञान द्वारा माने व जाने जाने वाले मूलकण अनादि नहीं हो सकते और तब उनमें होने वाली किसी भी प्रकार की क्रिया वा गति भी अनादि नहीं हो सकती। यदि कोई यह हठ करे कि मान लीजिये कि मूलकण प्राणादि सूक्ष्म पदार्थ वा प्रकृति रूप सूक्ष्मतम पदार्थ से बने हैं, तब भी उस सूक्ष्म वा सूक्ष्मतम कारण पदार्थ में गति अनादि क्यों नहीं हो सकती? क्यों इसके लिए चेतन ईश्वर तत्व की आवश्यकता होती है?इस विषय पर हम इस प्रकार विचार करते हैं- इस सृष्टि में जो भी गति एवं बल का अस्तित्व है, वह पदार्थ की सूक्ष्मतम अवस्था तक प्रभावी होता है। पदार्थ के अणुओं में होने वाली कोई भी क्रिया, बल आदि का प्रभाव उसमें विद्यमान आयन्स तक होता है। आयन्स में होने वाली प्रत्येक गति व बल आदि का प्रभाव वा सम्बन्ध इलेक्ट्रॉन्स, प्रोटोन्स, न्यूट्रॉन्स वा क्वार्स व ग्लूआॅन्स तक होता है। हमारा विश्वास है कि वर्तमान विज्ञान भी इसे मिथ्या नहीं कहेगा। इन सूक्ष्म कणों की संरचना व स्वरूप के विषय में वर्तमान विज्ञान अनभिज्ञ है, इस कारण इनमें होने वाली गति, क्रिया, बल आदि के प्रभाव की व्यापकता के विषय में वह अनभिज्ञ है। यह प्रभाव प्राण, मन व वाक् तत्वों तक व्याप्त होता है, जो मूल प्रकृति व ईश्वर में समाप्त हो जाता है। वस्तुतः ईश्वर तत्व में कोई क्रिया नहीं होती और प्रकृति में क्रिया ईश्वरीय प्रेरणा से होती है, परन्तु उससे प्रकृति का मूल स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। यह सब ज्ञान वर्तमान विज्ञान या तकनीक के द्वारा होना सम्भव नहीं है। गति व बल की व्याप्ति के पश्चात् हम यह भी विचार करें कि इस ब्रह्माण्ड में हो रही प्रत्येक क्रिया अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से हो रही है। समस्त सृष्टि अनायास किसी क्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि प्रत्येक क्रिया अत्यन्त व्यवस्थित व विशेष प्रयोजनानुसार हो रही है। मूलकण, क्वाण्टा आदि सूक्ष्म पदार्थ किंवा विभिन्न विशाल लोक लोकान्तर आदि पदार्थ जड़ होने से न तो बुद्धिमत्तापूर्ण क्रियाएं कर सकते हैं और न वे अपनी क्रियाओं का प्रयोजन ही समझ सकते हैं।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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