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ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 7


दर्शन व वैदिक विज्ञान (Philosophy and Vaidic Science) जब न्यूटन ने सेव के फल को वृक्ष से नीचे गिरते देखा था, उस समय उसके मन में इस ऊहा व तर्क की उत्पत्ति हुई कि सेव नीचे ही क्यों गिरा? उनके इसी विचार से गुरुत्वाकर्षण की खोज और एतदर्थ किये प्रयोग, परीक्षण व प्रयोगों की नींव रखी गयी। सेव गिरते अनेक लोग देखते हैं वा उस समय भी देखते थे परन्तु यह विचार न्यूटन के मस्तिष्क में ही आया, क्योंकि वे तर्क व ऊहा से संपन्न व्यक्ति थे। दर्शन को आंग्ल भाषा में #Philosophy कहा जाता है, जिसकी परिभाषा करते हुए Chambers Dictionary में लिखा है- "In pursuit of widom and knowledge, investigation contemplation of the nature of being knowledge of the causes and laws of all things. The principles Underlying any sphere of knowledge, reasoning."Oxford Advanced Learners dictionary में इसे इस प्रकार परिभाषित किया है-Search for knowledge and understanding of the nature and meaning of the Universe and humanlife. आज सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विद्यमान विभिन्न वस्तुओं, उनके कारण तथा कार्य करने के सिद्धांतों आदि को तर्क व ऊहा के आधार पर जानने का प्रयत्न करना ही दर्शन कहलाता है। इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञान व दर्शन दोनों का उद्देश्य ब्रह्माण्ड को जानने का प्रयास करना है। दोनों प्रक्रियाओं में कुछ भेद अवश्य है परन्तु दोनों का उद्देश्य समान है। विज्ञान का क्षेत्र मानव तकनीक के सामर्थ्य तक सीमित है और दर्शन का क्षेत्र चिन्तन, मनन, ऊहा की सीमाओं तक फैला है। कहीं विज्ञान प्रेक्षणादि कर्मों की विद्यमानता में भी मूल कारण वा नियमादि विषयों में भ्रमित हो सकता है, तो कहीं दर्शन भी दार्शनिकों (विशेषकर परम सिद्ध योगियों के अतिरिक्त) की कल्पनाओं के वेग में बहकर भ्रांत हो सकता है। हमें दोनों ही विधाओं का विवेक सम्मत उपयोग करने का प्रयत्न करना चाहिये। अब हम विज्ञान व दर्शन की सीमा और समन्वय को दर्शाते हुए सृष्टि के एक नियम पर विचार करते हैं। जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि एक धनावेशित वस्तु दूसरी ऋणावेशित वस्तु को क्यों आकर्षित करती है? तब इस ज्ञान की प्रक्रिया में सर्वप्रथम हमें यह अनुभव होता है कि विपरीत आवेश वाली कोई भी वस्तु एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं। यहाँ आकर्षण बल है, तो उसका कारण भी होगा, यह विचार करना दर्शन का क्षेत्र है। कोई दो वस्तुएं परस्पर निकट आ रही हैं, तब उनके मध्य कोई आकर्षण बल कार्य कर रहा होगा, यह जानना भी दर्शन का क्षेत्र है। अब उन आकर्षित हो रही वस्तुओं पर विपरीत वैद्युत आवेश है, यह बताना विज्ञान का कार्य है। यह आवेश कैसे काम करता है? यह बताना भी विज्ञान का कार्य है। वर्तमान विज्ञान ने जाना कि जब दो विपरीत आवेश वाले कण जब निकट आते हैं, तब उनके मध्य #Virtual_Photons उत्पन्न और संचरित होने लगते हैं। ये Particles (Photons) ही आकर्षण बल का कारण बनते हैं। ये Particles वर्तमान विज्ञान के मत में उन दोनों कणों के मध्य विद्यमान #Space को संकुचित करके उन कणों को परस्पर निकट लाने का कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया को जानना विज्ञान का काम है। कदाचित् वर्तमान विज्ञान की सीमा यहाँ समाप्त हो जाती है। इसके आगे दर्शन वा वैदिक विज्ञान की सीमा प्रारम्भ होती है।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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