#विज्ञान_क्या_है? इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक भौतिक विज्ञान बल एवं ऊर्जा को ठीक-२ समझ नहीं पा रहा है। वे कैसे कार्य करते हैं, यह अज्ञात है। सूक्ष्म परमाणुअणु अथवा तरंगें कैसे सतत चल रही हैं? यह भी सर्वथा अज्ञात है। Feynman की यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति सराहनीय है। वस्तुतः वर्तमान विज्ञान की कार्यशैली की एक सीमा होती है । #Science शब्द का अर्थ करते हुए Chambers Dictionary में लिखा है- "Knowledge ascertained by observation and experiment, critically tested, systematizedand brought under general principles, esp in relation to the physical world, a department ora branch of such knowledge or study. ”Oxford advanced learners dictionary के Indian Edition में Science का अर्थ इस प्रकार किया है- "Organized knowledge esp when obtained by observation and testing of facts, about the physical world, natural laws." इन दोनों परिभाषाओं से स्पष्ट है कि भौतिक जगत् का जो ज्ञान प्रयोगों, प्रेक्षणों और विविध परीक्षणों से सुपरीक्षित एवं व्यवस्थित होता है, वह आधुनिक विज्ञान की सीमा में माना जाता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हमारे पास परीक्षण के जितने अधिक साधन उपलब्ध हों, हमारा विज्ञान उतना अधिक परीक्षण करके सृष्टि के पदार्थों को जान सकता है। अपने तकनीकी साधनों की सीमा के बाहर विद्यमान कोई भी पदार्थ, चाहे कितना भी यथार्थ क्यों न हो, उसे विज्ञान स्वीकार नहीं कर सकता। पश्चिमी देशों के विज्ञान को आइजक न्यूटन से पूर्व गुरुत्वाकर्षण बल का पता नहीं था, गैलीलियो एवं कॉपरनिकस के पूर्व पृथिवी के आकार व परिक्रमण का ज्ञान नहीं था, तब तक उनके लिए गुरुत्वाकर्षण बल, पृथिवी का गोलाकार होना तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करना आदि विषय विज्ञान के क्षेत्र में नहीं आते थे अर्थात् ये सभी तथ्य कल्पनामात्र थे। परन्तु जब इन वैज्ञानिकों ने इन पर प्रेक्षण व प्रयोग, तो ये सभी तथ्य वैज्ञानिक सत्य रूप में प्रतिष्ठित हो गये। आज संसार में जो भी नये-२ आविष्कार हो रहे हैं, वे अब से पूर्व कल्पना के विषय थे परन्तु अब विज्ञान व तकनीक बन गये। इसी कारण कहा जाता है कि विज्ञान परिवर्तनशील है। इसे वर्तमान विज्ञान की विशेषता कहें वा अपूर्णता, यह वैज्ञानिकों को स्वयं विचारना चाहिये। मैं सूर्य को देख पाऊँ वा नहीं, इससे सूर्य और उसके विज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा, तब मैं इसे अपने प्रेक्षणों व प्रयोगों की सीमा में कठोरतापूर्वक क्यों बांधने का हठ करूँ? स्थूल रूप से ज्ञान के दो क्षेत्र हैं। एक वह है, जिसके प्रेक्षण व प्रयोग की तकनीक वर्तमान में उपलब्ध हैं, दूसरा वह है, जिसके प्रयोग व परीक्षण की तकनीक मनुष्य द्वारा विकसित किये जाने की सम्भावना हो सकती है। इसके अतिरिक्त ज्ञान का एक क्षेत्र ऐसा भी है, जिसका प्रयोग व परीक्षण किसी तकनीक से सम्भव नहीं, बल्कि जिसे योग साधनाजन्य दिव्यदृष्टि से ही जाना जा सकता है। इन तीनों प्रकार के ज्ञान में उचित तर्क का होना अनिवार्य है। जो बात सामान्य सुतर्क तथा ऊहा की दृष्टि से ही असम्भव प्रतीत हो, वह उपर्युक्त तीनों प्रकार के ज्ञान में से एक भी ज्ञान के क्षेत्र में नहीं आयेगी। यहाँ ऊहा व तर्क का यथार्थ आशय भी गम्भीर विचारक ही जान सकते हैं, सामान्य व्यक्ति नहीं। जिस-२ व्यक्ति की प्रतिभा, साधना जितनी-२ अधिक होगी, उस उसकी तर्क व ऊहा शक्ति उतनी-२ अधिक यथार्थ होगी। इस कारण वर्तमान विज्ञान को अपने क्षेत्र के बाहर जाकर सुतर्क व ऊहा की दृष्टि से भी विचारना चाहिये। यदि कोई सज्जन यह कहेकि सुतर्क व ऊहा का विज्ञान के क्षेत्र में कोई महत्व नहीं है, मैं उस सज्जन को कहना चाहूंगा कि विज्ञान का जन्म सुतर्क एवं ऊहा रूप दर्शन से ही होता है और जहाँ विज्ञान का सामर्थ्य वा क्षेत्र समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी समाप्ति सुतर्क व ऊहा रूप दर्शन में ही होती है किंवा विज्ञान की चरम सीमा से परे दर्शन की सीमा पुन: प्रारम्भ होती है।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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