अब हम ईश्वर के अस्तित्व पर नये सिरे से विचार करते हैं- हमने अब तक वैज्ञानिकों से जो भी चर्चा सृष्टि विज्ञान पर की है, उससे एक विचार यह सामने आता है कि वैज्ञानिक ‘क्यों’ प्रश्न का उत्तर नहीं देते क्योंकि उनकी दृष्टि में यह विज्ञान का विषय नहीं है। हम संसार में नाना स्तरों पर निम्न प्रश्नवाचक शब्दों का सामना करते हैं 1. क्यों 2. किसने 3. किसके लिए 4. क्या5. कैसे आदिइन प्रश्नों में से ‘क्या’, 'कैसे’ के उत्तर के विषय में वर्तमान विज्ञान विचार करने का प्रयास करता प्रतीत हो रहा है। यद्यपि इन दोनों ही प्रश्नों का पूर्ण समाधान तो विज्ञान के पास नहीं परन्तु प्रयास अवश्य ईमानदारी से हो रहा है। अन्य प्रश्न ‘क्या’, ' किसने’ एवं 'किसके लिए’ इन तीन प्रश्नों के विषय में विचार करना भी आधुनिक विज्ञान के लिए किंचिदपि रुचि का विषय नहीं है। हम इन प्रश्नों के आशय पर क्रमशः विचार करते हैं- 1. क्यों- यह प्रश्न प्रयोजन की खोज के लिए प्रेरित करता है। हम निःसन्देह सारे जीवन नाना प्रकार के कर्मों को करते एवं नाना द्रव्यों का संग्रह करते हैं। इन सबका कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है। कोई भी बुद्धिमान् प्राणी किसी न किसी प्रयोजन हेतु ही कोई प्रवृत्ति रखता है। मूर्ख मनुष्य भले ही निष्प्रयोजन कर्मों में प्रवृत्त रहता हो, बुद्धिमान् तो कदापि ऐसा नहीं करेगा। संसार पर विचार करें कि यह क्यों बना व क्यों संचालित हो रहा है? इसकी प्रत्येक गतिविधि का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य है। 'क्यों' प्रश्न की उपेक्षा करने वाला कोई वैज्ञानिक क्या यह मानता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निष्प्रयोजन रचना है? हमारे विचार से प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम ‘क्यों' प्रश्न का उत्तर ही खोजने का यत्न करना चाहिये। जिस प्रकार वह कोई कर्म करने से पूर्व उसका प्रयोजन जानता है, उसी प्रकार इस सृष्टि के उत्पन्न होने, किसी शरीरधारी के जन्म लेने का प्रयोजन जानने का भी प्रयत्न करना चाहिये। वर्तमान विज्ञान के इस प्रश्न से दूर रहने से ही आज वह अनेकों अनुसन्धान करते हुए भी उनके प्रयोजनव दुष्प्रभाव पर विचार नहीं करता है। इसी कारण मानव को अपने विविध क्रियाकलापों, यहाँ तक कि जीने के भी प्रयोजन का ज्ञान नहीं होने से भोगों की अति तृष्णा में भटकता हुआ अशान्ति व दुःखों के जाल में फंसता जा रहा है। 2. किसने- यह प्रश्न ‘क्यों’ से जुड़ा हुआ है। कोई कार्य किस प्रयोजन के लिए हो रहा है, इसके साथ ही इससे जुड़ा हुआ अन्य प्रश्न यह भी उपस्थित होता है कि उस कार्य को किसने सम्पन्न किया अथवा कौन सम्पन्न रहा है अर्थात् उसका प्रायोजक कौन है? इस सृष्टि की प्रत्येक क्रिया का एक निश्चित प्रयोजन है, साथ ही उसका प्रायोजक कोई चेतन तत्व है। कोई जड़ पदार्थ प्रायोजक नहीं होता। जड़ पदार्थ प्रयोजन की सामग्री तो बन सकता है परन्तु उसका कर्त्ता अर्थात् प्रायोजक नहीं। चेतन तत्व ही जड़ तत्व पर साम्राज्य व नियन्त्रण करता है। चेतन तत्व स्वतन्त्र होने से कर्त्तापन का अधिकारी है, जबकि जड़ पदार्थ स्वतन्त्र नहीं होने से कर्त्तृत्व सम्पन्न नहीं हो सकता। 3. किसके लिए- यह प्रश्न इस बात का विचार करता है कि किसी कर्ता ने कोई कार्य किया वा कर रहा है, तो क्या वह कार्य स्वयं के लिए किया वा कर रहा है अथवा अन्य किसी चेतन तत्व के लिए कर रहा है? यहाँ कोई उपभोक्ता होगा और उपभोक्ता भी चेतन ही होता है। जड़ पदार्थ कभी भी न तो स्वयं का उपभोग कर सकता है और न वह दूसरे जड़ पदार्थों का उपभोग कर सकता है। 4. क्या- यह प्रश्न पदार्थ के स्वरूप की पूर्णतः व्याख्या करता है। जगत् क्या है? इसका स्वरूप क्या है? मूल कण क्या हैं? ऊर्जा व द्रव्य क्या है? बल क्या है? इन सब प्रश्नों का समाधान इस क्षेत्र का विषय है। वर्तमान विज्ञान तथा दर्शन शास्त्र दोनों इस प्रश्न का उत्तर देने का यथासम्भव प्रयास करते हैं। इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। वर्तमान विज्ञान इस प्रश्न का सम्पूर्ण उत्तर देने में समर्थ नहीं है। जहाँ विज्ञान असमर्थ हो जाता है, वहाँ वैदिक विज्ञान किंवा दर्शन शास्त्र इसका उत्तर देता है। 5. कैसे- कोई भी क्रिया कैसे सम्पन्न होती है? जगत् कैसे बना है? द्रव्य व ऊर्जा कैसे व्यवहार करते हैं? बल कैसे कार्य करता है? इन सभी प्रश्नों का समाधान इस क्षेत्र का विषय है। वर्तमान विज्ञान इस क्षेत्र में कार्य करता है परन्तु इसका भी पूर्ण सन्तोषप्रद उत्तर इसके पास नहीं है। अन्य प्रश्नों के उत्तर जाने बिना इसका सन्तोषप्रद उत्तर मिल भी नहीं सकता।इन पांच प्रश्नों के अतिरिक्त अन्य कुछ प्रश्न भी हैं, जिनका समायोजन इन पांचों प्रश्नों में ही प्रायः हो सकता है ।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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