(ईश्वर का वैज्ञानिक स्वरूप)

सष्टिकर्ता- इस सृष्टि के रचयिता, नियन्त्रक व संचालक के रूप में चेतन तत्व ईश्वर की सिद्धि के उपरान्त हम यह विचार करते हैं कि वह वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध किया हुआ ईश्वर स्वयं कैसा है? इस पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करते हैं-

सत् स्वरूप- सर्वप्रथम वह ईश्वर नित्य होना चाहिये। यदि वह ईश्वर अनित्य हो गया, तब उसे बनाने वाली कोई उससे भी महती चेतन सत्ता विद्यमान होनी चाहिये, जो किसी अनित्य ईश्वर नामक पदार्थ को उत्पन्न कर सके। यदि ऐसा हो भी, तब वह महती चेतन सत्ता अवश्य अनादि, नित्य होनी चाहिये। यदि ऐसा मानें, तो उस अनादि चेतन सत्ता को ही ईश्वर नाम दिया जाये, न कि अनित्य सत्ता को अनादि माना जाये। इस कारण ईश्वर सत् स्वरूप सिद्ध होता है। ध्यातव्य है कि कोई भी चेतन सत्ता कभी किसी के द्वारा नहीं बनाई जा सकती और न स्वयं ही बनती है, बल्कि वह निश्चित रूप से अनादि ही होती है।

चित् स्वरूप- वह ईश्वर सत् स्वरूप होने के साथ चेतन भी होना चाहिये, क्योंकि चेतन सत्ता ही इच्छा, ज्ञान व प्रयत्न इन तीनों गुणों से युक्त होकर नाना प्रकार की रचनाओं को सम्पादित कर सकती है।

आनन्द स्वरूप- इसके साथ वह सत्ता आनन्द स्वरूप भी होनी चाहिये। इसका कारण यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि को रचने में उसे किचित् भी क्लेश, दुख आदि नहीं होना चाहिये। यदि वह सत्ता दुख व क्लेश से युक्त होने की आशंका से ग्रस्त हो जाये, तब वह सृष्टि रचना जैसे महान् कर्म को नहीं कर सकेगी। इसलिए ईश्वर तत्व की परिभाषा करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा है-

"क्लेशकर्मविपाकाशयैपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर:" (यो. द. १.२४)

अर्थात् अविद्यादि क्लेश, पाप-पुण्य आदि कर्म एवं उसके फलों, वासनाओं से पृथक् पुरुष अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शयन करने वाला अर्थात् व्याप्त रहने वाला चेतन तत्व ईश्वर कहाता है। इस कारण वह सदैव आनन्द स्वरूप ही है। इसीलिए महर्षि दयानन्द ने ईश्वर को सच्चिदानन्द कहा है।

सर्वव्यापक- हम जानते हैं कि हमारी सृष्टि में वर्तमान वैज्ञानिक कदाचित् दो अरब गैलेक्सियों को देख या अनुभव कर चुके हैं। हमारी ही गैलेक्सी में लगभग दो अरब तारे हैं। वैज्ञानिक अब तक देखे गये ब्रह्माण्ड की त्रिज्या 10^26 m मानते हैं। दो गैलेक्सियों के मध्य अरबों-खरबों किलोमीटर क्षेत्र में कोई लोक नहीं होता, पुनरपि सम्पूर्ण रिक्त स्थान में सूक्ष्म हाइड्रोजन गैस अत्यन्त विरल अवस्था में भरी रहती है। उसके मध्य भी Vacuum Energy भरी रहती है। सारांश यह है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में नितान्त रिक्त स्थान कहीं नहीं है। इसमें हमारे सूर्य से करोड़ों गुने बड़े तारे भी विद्यमान हैं, तो सूक्ष्म लेप्टॉन, क्वार्क एवं क्वाण्टाज् भी विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त इनसे भी सूक्ष्म प्राण, छन्द व मनतत्वादि पदार्थ विद्यमान हैं। इन सभी स्थूल व सूक्ष्म पदाथों में गति व बल की विद्यमानता है। सबमें सृजन व विनाश का खेल हो रहा है। इस कारण जहाँ -२ यह खेल चल रहा है, वहाँ -२ ईश्वर तत्व भी विद्यमान होना चाहिये। इसका आशय यह है कि ईश्वर सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों में भी विद्यमान है तथा स्थूल से स्थूलतम पदार्थों में भी विद्यमान है। इसी कारण कठ उपनिषद् के ऋषि ने कहा

"अणोरणीयान् महतो महीयान्" ( कठ.उ.२.२०)

अर्थात् वह परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान से महान् है। इस कारण वह सर्वव्यापक है।

यजुर्वेद ने कहा है- "ईशावास्यमिद्ँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (यजु. ४०.१ )

अर्थात् वह ईश्वर इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर उसे आच्छादित किये हुए है। इस प्रकार वह ईश्वर सर्वव्यापक सिद्ध होता है। वह एकदेशी कभी नहीं हो सकता।

सर्वशक्तिमान्- इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बनाने, चलाने व नियन्त्रित करने वाला सर्वव्यापक ईश्वर तत्व सर्वशक्तिमान् ही होना चाहिये। आज का विज्ञान इस बात से अवगत है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कितना विशाल है? सूक्ष्म कणों से लेकर विशाल लोकों की रचना करना, उन्हें गतियां प्रदान करना, सभी बलों व ऊर्जाओं को भी बल व ऊर्जा प्रदान करना, किसी सामान्य शक्ति वाले तत्व का सामर्थ्य नहीं है, इस कारण वह ईश्वर तत्व सर्वशक्तिमान् ही हो सकता है। यहाँ ध्यातव्य है कि ‘सर्वशक्तिमान्' का अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर बिना किसी उपादान पदार्थ के शून्य से सृष्टि रचना कर सकता है अथवा वह बिना किसी नियम के चमत्कार-पूर्वक कुछ भी कर सकता है, उसके लिए किसी भी कार्य का करना असम्भव नहीं है, ऐसा कथन उचित नहीं है। ईश्वर स्वयं नियामक है, जो अपने ही नियमों के अनुसार कार्य कर सकता है, अन्यथा कार्य नहीं कर सकता। उसकी सर्वशक्तिमत्ता तो इस बात में है कि वह इतनी बड़ी सृष्टि को बिना किसी की सहायता से बनाता, चलाता व समय आने पर उसका प्रलय भी करता है।

निराकार- अब इस बात पर विचार करें कि जो पदार्थ सर्वशक्तिमान् अर्थात् अनन्त ऊर्जा व बल से युक्त एवं सर्वव्यापक होगा, उसका आकार क्या होगा? हम यह समझते हैं कि इस विषय में सामान्य बुद्धि वाला भी यही कहेगा कि सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमती सत्ता का कोई आकार नहीं होगा। वस्तुतः ऊर्जा व बल जैसे गुण किसी साकार पदार्थ में होते ही नहीं है। इस संसार में साकार पदार्थों में जो भी बल या ऊर्जा दिखाई देती है, वह वस्तुतः उस साकार पदार्थ के अन्दर विद्यमान अन्य निराकार पदार्थ की ही होती है। विभिन्न विशाल वा लघु यन्त्रों में विद्युत्, जो निराकार ही होती है, आदि का ही बल विद्यमान होता है। प्राणियों के शरीरों में चेतन जीवात्मा का भी बल कार्य करता है। निराकार विद्युत् आदि पदार्थों में चेतन परम तत्व ईश्वर का बल कार्य करता है, यह बात हम पूर्व में ही लिख चुके है। जो ईश्वर तत्व प्रत्येक सूक्ष्म व स्थूल पदार्थों में व्याप्त होकर उन्हें बल व ऊर्जा प्रदान कर रहा है, वह केवल निराकार ही हो सकता है, साकार कदापि नहीं।

सर्वज्ञ- ईश्वरतत्व की सर्वशक्तिमत्ता के पश्चात् उसकी सर्वज्ञता पर विचार करते हैं। यह सामान्य बद्धि की बात है कि आधुनिक जगत् में एक-२ यन्त्र बनाने वाला इंजीनियर तथा ब्रह्माण्ड के कुछ रहस्यों को जानने वाला एक वैज्ञानिक बहुत बुद्धिमान् माना जाता है। ऐसी स्थिति में जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को रचता और चलाता है, वह कितना ज्ञानी होगा? वस्तुतः वह ईश्वर सर्वज्ञ ही होता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिसे जानने का प्रयास, यह धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव करोड़ों वर्षों से करता रहा है और जब तक सृष्टि रहेगी, वह ऐसा प्रयास करता भी रहेगा परन्तु उसे कभी पूर्णतः नहीं जान सकेगा। वह ऐसा ब्रह्माण्ड जिसने बनाया है, जो उसे चला रहा है, वह निश्चित ही सर्वज्ञ अर्थात अनन्त ज्ञान वाला ही होगा।

पवित्र- वह ऐसा ईश्वर कभी भी सृष्टि के उपादान कारण रूप पदार्थ में मिश्रित नहीं होता, इसी कारण उसे पवित्र भी कहते हैं अर्थात् वह सदैव विशुद्ध रूप में विद्यमान रहता है, इसी कारण ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण माना जाता है, जबकि प्रकृति रूपी मूल पदार्थ इस सृष्टि का उपादान कारण माना जाता है। यही यथार्थता है। इसके साथ ही यह भी तथ्य है कि ईश्वर कभी किसी भी प्रकार के दोष से किचिदपि ग्रस्त नहीं हो सकता।

सर्वाधार- ऐसा वह ईश्वर ही इस ब्रह्माण्ड को बनाता, चलाता हुआ उसे धारण भी कर रहा है, इस कारण वह सर्वाधार कहलाता है। वर्तमान विज्ञान इसके धारण में गुरुत्वाकर्षण बल एवं डार्क मैटर की भूमिका मानता है। यह सत्य भी है परन्तु इन धारक पदार्थों का धारक स्वयं ईश्वर तत्व ही है।

न्यायकारी-दयालु- ऐसा वह ईश्वर तत्व निश्चित ही सर्वदा सर्वथा पूर्ण व तृप्त वा अकाम होना चाहिये। तब वह इस सृष्टि की रचना स्वयं के लिए नहीं बल्कि किसी अन्य अपूर्णकाम चेतन तत्व के उपभोग व मोक्ष हेतु करता है। वह अपूर्णकाम चेतन तत्व ही जीवात्मा कहाता है। यहाँ 'अपूर्ण' अर्थ का यह समझना चाहिये कि वह बल, ज्ञान व आयतन आदि की दृष्टि से ईश्वर की अपेक्षा अत्यन्त लघु है। क्योंकि वह ईश्वर अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि जीवों की भलाई के लिए ही सष्टि रचना करता है, इस कारण वह दयालु कहलाता है। वह सदैव जीवों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देता है, न उससे अधिक और न्यून, इसी कारण उसे न्यायकारी भी कहा जाता है। कर्मानुसार फल का मिलना चेतन पदार्थ जगत् में कारण कार्य के नियम के समान है। जड़ जगत् में हम सर्वत्र कारण कार्य का नियम देखते हैं। वर्तमान विज्ञान भी जड़ जगत् में कारण कार्य के नियम को स्वीकार करते हैं। Arthur Beiser लिखते हैं-

"cause and effects are still related in quantum mechanics, but what they concern needs careful interpretation" (Concepts of Modern Physics- P. 161)