महर्षि गौतम ने किसी सिद्धान्त (Theory) के निरूपण के उपायों के पांच अवयव बतलाये हैं-"प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवा:’’ (न्या.द.१.१.३२) अर्थात् ये पांच अवयव इस प्रकार हैं- (​1​) प्रतिज्ञा= गति अनित्य है। ​​(​2​) हेतु= क्योंकि हम इसे उत्पन्न व नष्ट होते देखते हैं। (​3​) उदाहरण= जैसे लोक में जड़ पदार्थों वा चेतन प्राणियों द्वारा नाना प्रकार की गतियों का उत्पन्न होना देखा जाता है, साथ ही उन गतियों का विराम भी चेतन द्वारा होना देखा जाता है । (​4​) उपनय= उसी प्रकार अन्य गतियां भी अनित्य हैं। (​5​) निगमन= सभी दृष्ट वा अदृष्ट गतियां अनित्य हैं।गति की अनित्यता की सिद्धि के साथ इसी प्रकार गति के पीछे चेतन कर्ता के अस्तित्व की सिद्धि करते हैं- (​1​) प्रतिज्ञा = गति मूलतः चेतन के बल द्वारा उत्पन्न व नियन्त्रित होती है । (​2​) हेतु= हम जगत् में विभिन्न गतियों को विभिन्न चेतन प्राणियों द्वारा उत्पन्न व नियन्त्रित होना देखते हैं। (​3​) उदाहरण= जैसे हम स्वयं नाना गतियों को उत्पन्न व नियन्त्रित करते हैं। (​4) उपनय= उसी प्रकार अन्य गतियां, जिनका कोई प्रेरक व नियंत्रक साक्षात् दिखाई नहीं देता, वे भी किसी अदृष्ट चेतन तत्व (ईश्वर आदि) द्वारा नियन्त्रित व प्रेरित होती हैं। (​5​) निगमन = सभी प्रकार की गतियों को उत्पन्न, प्रेरित व नियन्त्रित करने वाला कोई न कोई चेतन तत्व (ईश्वर अथवा जीव) अवश्य होता है अर्थात् बिना चेतन के गति उत्पन्न, नियन्त्रित व संचालित नहीं हो सकती। इसी प्रकार बल के विषय में विचार करते हैं (​1​) प्रतिज्ञा प्रत्येक बल के पीछे चेतन तत्व की भूमिका है। (​2​) हेतु= क्योंकि हम चेतन प्राणियों में बल का होना देखते हैं।(​3​) उदाहरण= जैसे लोक में हम नाना क्रियाओं में अपने बल का उपयोग करते हैं। (​4​) उपनय= उसी प्रकार सृष्टि में जो विभिन्न प्रकार के बल देखे जाते हैं, उन सबमें किसी अदृष्ट चेतन की भूमिका होती है। (​5​) निगमन= प्रत्येक बल के पीछे किसी न किसी चेतन (ईश्वर अथवा जीव) की मूल भूमिका अवश्य होती है किंवा वह बल उस चेतन का ही होता है। जड़ पदार्थ में अपना कोई बल नहीं होता है।अब बुद्धिगम्य कार्यों में चेतन तत्व की भूमिका पर विचार करते हैं- (​1​) प्रतिज्ञा= प्रत्येक बुद्धिगम्य, व्यवस्थित रचना के पीछे चेतन तत्व की भूमिका होती है। (​2​) हेतु= क्योंकि हम चेतन प्राणियों द्वारा बुद्धिगम्य कार्य करते देखते हैं। (​3​) उदाहरण= जैसे हम अपनी बुद्धि के द्वारा नाना प्रकार के कार्यों को सिद्ध करते हैं। (​4​) उपनय= उसी प्रकार सृष्टि में विभिन्न बुद्धिगम्य रचनाओं के पीछे ईश्वर रूपी अदृष्ट चेतन की भूमिका होती है। (​5​) निगमन सभी प्रकार की बुद्धिगम्य रचनाओं किंवा सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक क्रिया के पीछे चेतन तत्व की अनिवार्य भूमिका होती है। इस प्रकार संयोगजन्य पदार्थों के अनादि व अनन्त न हो सकने के साथ-२ विभिन्न गति, बल व बुद्धिमत्तापूर्ण रचनाओं के पीछे चेतन तत्व की अनिवार्य भूमिका होती है। कुछ कार्यों में जीव रूपी चेतन की भूमिका होती है। इसी कारण महर्षि वेदव्यास ने लिखा ‘‘सा च प्रशासनात्” (ब्र.सू.१.३.११) अर्थात् इस सम्पूर्ण सृष्टि की नाना क्रियाएं उस ब्रह्म के प्रशासन से ही सम्पन्न होती हैं।इस प्रकार जो भी पदार्थ सूक्ष्म कारण पदार्थों के संयोग से बनता है, तथा जो किसी अन्य से प्रेरित गति, बल, क्रिया आदि गुणों से युक्त होता है, वह पदार्थ अनादि नहीं हो सकता, जबकि जो पदार्थ ऐसे सूक्ष्मतम रूप में विद्यमान होता है, जिसका कोई अन्य कारण विद्यमान नहीं हो, वह अनादि हो सकता है। इससे प्रकट हुआ कि मूल प्रकृति रूप पदार्थ में जहाँ कोई गति आदि गुण विद्यमान नहीं रहते अनादि होता है। इसी अनादि पदार्थ से सर्वोच्च नियंत्रक, नियामक, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक व सर्वज्ञ ईश्वर तत्व इस सृष्टि की रचना समय-२ पर करता रहता है। कभी सृष्टि, तो कभी प्रलय होती रहती है। इस सृष्टि-प्रलय के चक्र का न तो कभी आदि है और न कभी अन्त। न तो कोई सृष्टि अनादि व अनन्त हो सकती है और न प्रलय परन्तु इनका चक्र अवश्य अनादि व अनन्त है । इस प्रकार हमने Big Bang Theory एवं Eternal Universe इन दोनों ही मान्यताओं को लेकर सृष्टि के रचयिता चेतन ईश्वर तत्व के अरिस्तत्व की अनिवार्यता को सिद्ध किया। String Theory एवं M-Theory दोनों ही Big Bang में ही विश्वास करती, इसी कारण इनको लेकर पृथक् से ईश्वर तत्व की सिद्धि आवश्यक नहीं है। प्रबुद्ध एवं प्रज्ञावान् पाठकों को चाहिये कि वे अपने-२ हठ, दुराग्रह व अहंकार को त्यागकर सच्ची वैज्ञानिकता का परिचय दें।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)